गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १२४ भाईसों कहत बात, कौसिकहि सकुचात बोल घन घोर-से बोलत थोर थोर हैं। सनमुख सबहि, बिलोकत सबहि नीके, कृपासों हेरत हँसि तुलसीकी ओर हैं॥ ६ ॥ 'रंगभूमिमें दशरथजीके पुत्र पधारे हैं'—यह सुनकर नगरके स्त्री, पुरुष सभी तमाशा देखनेके लिये चल पड़े, बालक और वृद्ध तथा अन्धे और पंगु भी [अपनेको ले चलनेके लिये] निहोरा कर रहे हैं॥ १॥ दोनों भाई नीले और पीले कमल, सुवर्ण एवं मरकतमणि तथा मेघ और बिजलीके-से वर्णवाले और रूपके सारस्वरूप ही हैं। वे स्वभावतः ही सुन्दर हैं, उनके राम और लक्ष्मण—ये मनोहर नाम हैं तथा जैसे सुने गये थे वैसे ही राजकुमारोंमें सिरमौर हैं ॥ २ ॥ उनके चरण कमलके समान हैं; जंघा, जानु और कटिप्रदेश बड़े सुन्दर हैं तथा कन्धे विशाल और भुजाएँ बड़ी बलशालिनी हैं। वे अति सुन्दर तरकस कसे हुए हैं तथा उनके करकमलोंमें अति मनोहर और कठोर धनुष-बाण शोभित हैं ॥ ३ ॥ उनके कानोंमें सोनेके कर्णफूल, गलेमें सुन्दर यज्ञोपवीत तथा शरीरमें अच्छे-अच्छे छोरोंवाले पीताम्बर सुशोभित हैं। उनके नयन कमलके तथा मुख चन्द्रमाके समान हैं, सिरपर चौतनी टोपियाँ हैं तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त प्रत्येक अङ्गमें ठौर-ठौरपर ठगौरी है। [अर्थात् प्रत्येक अङ्ग चित्तको ठग लेनेवाला है] ॥ ४ ॥ सभा श्रेष्ठ सरोवरके समान है तथा वहाँ एकत्र हुए लोग कमल एवं चकवा-चकवीतुल्य हैं। वे राम अज्ञानी और द्वेष माननेवाले राजाओंके चित्त, जिनमेंसे कुछ उल्लूके