गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ८८ बिजली छवि छीन ली है। मुख सुन्दर है तथा सिरपर जरीके कामकी पगिया विराजमान है ॥ १ ॥ शरीरमें अवस्थाके अनुसार अनेक प्रकार के आभूषण हैं, जिन्हें देखकर हृदयमें प्रेमकी लहर-सी आती है। भगवान्की मनोहर मूर्तिकी सूरत तुलसीदाससे नहीं कही जाती। वही जान सकता है जिसके हृदयमें वह पीड़ाके समान कसकती है ॥ २ ॥ राग तोड़ी [ ४५ ] राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये । सरजुतीर सम सुखद भूमि-थल, गनि-गनि गोइयाँ बाँटि लये ॥ १ ॥ कंदुक-केलि-कुसल हय चढ़ि-चढ़ि, मन कसि कसि ठोंकि ठोंकि खये । कर-कमलनि बिचित्र चौगानें, खेलन लगे खेल रिझये ॥ २ ॥ ब्योम बिमाननि बिबुध बिलोकत खेलक पेखक छाँह छये । सहित समाज सराहि दसरथहि बरषत निज तरु-कुसुम-चये ॥ ३ ॥ एक लै बढ़त, एक फेरत, सब प्रेम-प्रमोद-बिनोद-मये । एक कहत भइ हार रामजूकी, एक कहत भइया भरत जये ॥ ४ ॥ प्रभु बकसत गज बाजि, बसन-मनि, जय धुनि गगन निसान हुये । पाइ सखा-सेवक-जाचक भरि जनम न दुसरे द्वार गये ॥ ५ ॥ नभ-पुरपरति निछावरि जहाँ तहँ, सुर-सिद्धनि बरदान दये । भूरि-भाग अनुराग उमगि जे गापत-सुनत चरित नित ये ॥ ६ ॥ हारे हरष होत हिय भरतहि, जिते सकुच सिर नयन नये । तुलसी सुमिरि सुभाव-सील सुकृती तेइ जे एहि रंग रए ॥ ७ ॥ एक ओर राम और लक्ष्मण तथा दूसरी ओर भरत एवं शत्रुघ्नलाल हुए। उन्होंने सरयूतीरकी सुखदायक और समतलभूमिमें