गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ बालकाण्ड जाकर गिन-गिनकर साथी बाँट लिये ॥ १ ॥ फिर खेलमें रीझे हुए चारों भाई गेंदके खेलमें सधाये हुए घोड़ोंपर चढ़ फेंटा कसकर खम ठोंकते हुए करकमलोंसे विचित्र चौगान खेलने लगे ॥ २ ॥ आकाश- में देवतालोग विमानोंमें चढ़कर देख रहे हैं और खेलनेवालों तथा देखनेवालोंपर छाया किये हुए हैं । देवता लोग दशरथजीकी—उनके समाजके सहित—प्रशंसा करते हैं और कल्पवृक्षके पुष्पोंकी लड़ियाँ बरसाते हैं ॥ ३ ॥ सब बालक प्रेम, आनन्द और विनोदमें मग्न हैं। उनमेंसे एक ओरके बालक गेंदको लेकर आगे बढ़ते हैं तो दूसरी ओर के उन्हें लौटा देते हैं। कोई कहते हैं रामकी हार हुई और कोई कहते हैं भैया भरत जीते हैं ॥ ४ ॥ प्रभु हाथी, घोड़े, वस्त्र और मणियां बख्शते हैं; आकाशमें विमानोंसे जयध्वनिके सहित दुन्दुभियाँ बजायी जा रही हैं। प्रभुसे पारितोषिक पाकर सखा- सेवक और याचकगण जन्मभर दूसरेके द्वारपर नहीं गये ॥ ५ ॥ आकाशसे तथा नगरमें जहाँ-तहाँ निछावरकी वर्षा हो रही है तथा देवता और सिद्धगण 'आशीर्वाद दे रहे हैं। प्रभुके इन नित्य नवीन चरित्रोंको जो लोग प्रेममें भरकर गाते या सुनते हैं वे बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ६ ॥ भरतजीको खेलमें हार जानेपर तो हर्ष होता है और जीतनेपर सङ्कोचवश उनके सिर और नयन नीचे हो जाते हैं। [ अतः भगवान् बार-बार उन्हींकों जिता देते हैं। ] तुलसीदास कहते हैं प्रभुके ऐसे शील और स्वभावकों स्मरणकर जो इसी रङ्गमें रँगे हुए हैं वे लोग बड़े पुण्यशाली हैं ॥ ७ ॥ [ ४६ ] खेलि खेल सुखेलनिहारे । उतरि उतरि, चुचुकारि तुरंगनि, सादर जाइ जोहारे ॥ १ ॥