गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ६० बंधु-सखा-सेवक सराहि, सनमानि सनेह सँभारे। दिये बसन-गज-बाजि साजि सुभ साज सुभाँति सँवारे ॥ २ ॥ मुदित नयन फल पाइ गाइ गुन सुर सानंद सिधारे। सहित समाज राजमंदिर कहँ राम राउ पगु धारे ॥ ३ ॥ भूप-भवन घर-घर घमंड कल्यान कोलाहल भारे। निरखि हरषि आरती-निछावरि करत सरीर बिसारे ॥ ४ ॥ नित नए मंगल-मोद अवध सब, सब बिधि लोग सुखारे। तुलसी तिन्ह सम तेउ जिन्हके प्रभुतें प्रभु-चरित पियारे ॥ ५ ॥ खेल खेलनेवालोंने खेल समाप्त कर अपने घोड़ोंसे उतर-उतरकर उन्हें चुचकारते हुए श्रीरघुनाथजीको आदरपूर्वक प्रणाम किया ॥ १ ॥ प्रभुने अपने बन्धु, सखा और सेवकोंकी सराहना तथा सम्मान करते हुए उनके प्रति प्रेम प्रकट किया तथा बहुत-से वस्त्र और सुन्दर साजसे अच्छी तरह सजाये हुए अनेक हाथी-घोड़े दिये ॥ २ ॥ फिर अति आनन्दित हो, नेत्रोंका फल पा देवतालोग भगवान्का गुणगान करते हुए आनन्दपूर्वक अपने लोकोंको गये, और रामचन्द्रजीने भी अपने समाजसहित राजमन्दिरको प्रस्थान किया ॥ ३ ॥ राजभवन तथा घर-घरमें अति महान् मङ्गलमय कोलाहल छाया हुआ है। प्रभुको देख-देखकर कौसल्या आदि माताएँ शरीरकी सुध भूलकर हर्षित चित्तसे आरती तथा निछावर कर रही हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार अवधमें नित्यप्रति नया-नया मङ्गल और आनन्द हो रहा है। तुलसीदास कहते हैं, जिन्हें प्रभुसे भी प्रभुके चरित्र अधिक प्रिय हैं वे लोग भी उन (अवधवासियों) के ही समान हैं ॥ ५ ॥