भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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४७६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५। क० ११

अहरहः शंसति ) फिर इन ही आश्विन [ अश्वि देवता वाले ] सूक्तों के दो दो [ स्तोत्र ] हैं, एक एक समाहाव [ आवाहन स्तोत्र ] को दिन दिन वह बोलता है। (अश्विनौ वै देवानां भिषजौ, तस्मात् आश्विनानि सूक्तानि शंसन्ति ) दोनों अश्वी [ दिन रात ] ही विद्वानों के दो वैद्य हैं, इसलिये अश्वियों के सूक्तों को वे बोलते हैं। ( तत् अश्विभ्यां प्रददुः, इदं भिषज्यतम् इति ) वह [ यज्ञकर्म दोनों अश्वियों को उन्होंने दिया--इसकी तुम दोनों ओषधि करो। ( क्षेत्रवत्यः परिधानीयाः भवन्ति ) क्षेत्रवती [ क्षेत्र शब्द वाली ऋचायें जैसे-शं नो देवः सविता......... अथर्व १६ । १० । १० ] परिधानीया [ अन्तिम इष्टि ] होती हैं। ( यत्र हतः तत् प्रजाः अशनायन्तीः पिपासन्तीः संरुद्धाः स्थिता आसन् ) जहां वह [ यज्ञ ] मारा गया [ परिधानीय स्तोत्र ठीक न हुआ ], वहां प्रजायें भूख की मारी और प्यास की मारी रुकी हुई स्थित होती हैं। ( ताः दीनाः एताभिः यथाक्षेत्रं पाययाञ्चकार तर्पयाञ्चकार ) उन दीन [ दुखिया प्रजाओं ] को इन [ परिधानीया ऋचाओं ] से खेत के अनुसार उस [ यजमान ] ने जलपान कराया और तृप्त किया। (अथो इयं वै पृथिवी क्षेत्रम्, अस्याम् अदीनायाम् अन्ततः प्रतिष्ठास्यामहै इति ) फिर यह ही पृथिवी खेत है, इस अदीना [ बलवती और उपजाऊ पृथिवी ] पर अन्त में [ पुरुषार्थ के पीछे ] हम प्रतिष्ठा पावेंगे। ( त्रिष्टुभः याज्याः भवन्ति ) त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना, ज्ञान के सहारे वाली, वा त्रिष्टुप् छन्द वाली स्तुतियां ] याज्या [ यज्ञ करने योग्य ] होती हैं। (यत्र हतः, तत् प्रजाः अशनायन्तीः पिपासन्तीः संरुद्धाः स्थिताः बभूवुः ) जहां वह [ यज्ञ ] मारा गया है [ याज्या स्तोत्र ठीक नहीं होते ], वहां प्रजायें भूख की मारी, प्यास की मारी और रुकी हुई स्थित होती हैं। (ताः ह एव एनाः एताभिः यथौकसं व्यव- साययाञ्चकार ) उन ही इन [ प्रजाओं ] को इन [ याज्या स्तुतियों ] से घर घर के अनुसार उस [ यजमान ] ने उद्यमी बनाया। (तस्मात् एताः याज्याः भवन्ति, तस्मात् एताः याज्याः भवन्ति ) इसलिये यह [ प्रजायें ] याज्या [ पूजने योग्य ] होती हैं इस- लिये यह [ प्रजायें ] याज्या [ पूजनीया ] होती हैं ॥ १० ॥ भावार्थः-विचारशील पुरुष ही अपनी प्रजाओं अर्थात् सन्तानों और अन्य लोगों को उत्तम उत्तम उपायों द्वारा भूख प्यास से बचाकर सुखी रखते हैं ॥ १० ॥ विशेषः-सङ्केतित मन्त्र अर्थ सहित दिये जाते हैं। १- आश्विन सूक्त--इमा उ वां दिविष्ठ्य......। देखो गो० उ० ५ । ३ । विशेषः ४ । २-क्षेत्रवती ऋचा--शं नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्रा॒य॑माणः शं नो॑ भवन्तू॒षसो॑ वि॒भाती॑ः। शं नः॑ प॒र्जन्यो॑ भवतु प्र॒जाभ्यः॑ शं नः॑ क्षे॒त्रस्य॒ पति॑रस्तु श॒म्भुः-अथर्व० आवाहनमन्त्रयुक्तम् ( क्षेत्रवत्यः ) क्षेत्रपदयुक्ताः ( अशनाय तीः ) अशन-क्यच् शत्, ङीप् । अशनायन्त्यः । बुभुक्षिताः ( पिपासन्तीः ) पिपासन्त्यः । पिपासिताः ( दीनाः ) दुःखिताः ( पाययाञ्चकार ) जलपानं कारितवान् ( तर्पयाञ्चकार ) तर्पितवान् ( अदीनायाम् ) बलवत्याम् । शस्योत्पादिकायाम् ( प्रतिष्ठास्यामहै ) प्रतिष्ठिताः भविष्यामः ( व्यवसाययाञ्चकार ) व्यवसायमुद्योगं कारितवान् ॥