गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ
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४८४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । कं० १४ कण्डिका १४ ।। अहीन और एकाह यज्ञों में होत्रक लोगों की दो प्रकार की परिधानीया ऋचायें ।। ( उभय्यः होत्रकाणां परिधानीयाः भवन्ति, अहीनपरिधानीयाः च एका- हिन्यस्य = एकाहिन्यः च ) दो प्रकार की होत्रक लोगों [ तीन सहायक होताओं ] की परिधानीया [ समाप्ति वाली ऋचायें ] होती हैं, अहीनपरिधानीया [ बहुत दिन वाले यज्ञ की परिधानीया ] और एकाहिनी [ एक दिन वाले यज्ञ की ] । ( ततः एकाहिकीभिः एव मैत्रावरुणः परिदधाति, तेन अस्मात् लोकात् न प्रच्यवते ) इसलिये एकाहिकी [ एक दिन में होने वाले यज्ञ की ऋचाओं ] से ही मैत्रावरुण ऋत्विज् परिधानीया बोलता है, इस कारण इस लोक से वह [ यजमान ] नहीं गिरता है । ( आहिनीकीभिः अच्छा- वाकः स्वर्गस्य लोकस्य आप्त्यै ) आहिनीकी [ बहुत दिन में होने वाले यज्ञ की ऋचाओं] से अच्छावाक ऋत्विज् स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये [ परिधानीया बोलता है ] । ( उभ- यीभिः ब्राह्मणाच्छंसी, एवम् असौ उभौ इमं च अमुं च लोकं व्यन्वारभमाणः एति ) दोनों प्रकार वाली [ ऋचाओं ] से ब्राह्मणाच्छंसी [ परिधानीया बोलता है ], इस प्रकार से वह [ यजमान ] दोनों इस और उस लोक को निरन्तर पाता हुआ चलता है । (अथो अहीनं च एकाहं च, अथो संवत्सरं च अग्निष्टोमं च, अथो मैत्रावरुणं च अच्छावाकं च, एवम् असौ उभौ व्यन्वारभमाणः एति ) फिर अहीन [ बहुत दिनों में होने वाले ] और एकाह [ एक दिन में होने वाले यज्ञ ] को, फिर संवत्सर और अग्निष्टोम [ यज्ञ ] को, फिर मैत्रावरुण और अच्छावाक [ ऋत्विज् ] को, इस प्रकार वह [ यजमान ] दो दो को ग्रहण करता हुआ चलता है ॥ ( अथ ततः एकाहिकीभिः एव तृतीयसवने होत्रकाः परिदधति तेन अस्मात् लोकात् न प्रच्यन्ते ) फिर तब एकाहिकी [ एक दिन में होने वाले यज्ञ की ऋचाओं ] से ही तीसरे सवन में होत्रक लोग परिधानीयायें बोलते हैं, इस कारण इस लोक से वह [ यजमान ] नहीं गिरता । ( आहिनीकीभिः अच्छावाकः स्वर्गस्य लोकस्य समष्टयै ) आहिनीकी [ बहुत दिन में होने वाले यज्ञ की ऋचाओं ] से अच्छावाक स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये [परिधानीया बोलता है]। (तत् होता कामं शंसेत्, यत् होत्रकाः पूर्वेद्युः शंसेयुः) तब होता चाहे तो [ वे मन्त्र ] बोले, जो होत्रक लोगों ने पहिले दिन बोले थे । ( यत् वै होता, तत् होत्रकाः ) जो ही होता ऋत्विज् है वे ही होत्रक लोग हैं । (प्राणः वै होता,
१४--( उभय्यः ) उभय--ङीप् द्विविधाः ( एकाहिन्यस्य ) लेखप्रमादः । एकाहिन्यश्च । एकाह--इनिः, ङीप्, जसि रूपम् । एकाहिन्यः । एकाहयज्ञे विहिता ऋचः ( एकाहिकीभिः ) एकाह--ठन्, ङीप् । ऐकाहिकाभिः । एका- हविहिताभिः ( परिदधाति ) परिधानीयां शंसति ( आहिनीकीभिः ) अहीन --ठक्, ङीप्, वर्णव्यत्ययः । आहीनीकीभिः । अहीनेषु अहर्गणेषु विहिताभिः ( व्यन्वारभमाणः ) लस्य रः । विविधमालभमानः स्पृशन् ( एति ) गच्छति । प्राप्नोति ( कामम् ) यथाकामम् । यथेष्टम् (समानः ) तुल्यः ( पूर्वेद्युः ) सद्यः