भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ११ ॥ २३ विचरा १० ॥ इतिहास [ बड़े लोगों का वृत्तान्त ] और पुराण [ पुराने लोगों का वृत्तान्त ] और गाथायें [ गाने योग्य वेद मन्त्र शिक्षाप्रद श्लोक आदि ] और नाराशंसी [ वीर नरों की गुणकथायें ] उस [ व्रात्य परमात्मा ] के पीछे चलीं ॥ ११ ॥ वह [ विद्वान् ] पुरुष निश्चय करके इतिहास का पुराण का गाथाओं का और नाराशंसियों का प्रिय धाम [ घर ] होता है, जो ऐसे वा व्यापक [ व्रात्य परमात्मा ] को जानता है ॥ १२ ॥ विशेषः-२ सर्प शब्द का अर्थ लोक है, देखो-दयानन्द भाष्य और महीधर भाष्य यजुर्वेद । १३ । ६, (असुराः) प्राण वाले-निरु० ३ । ८ ॥ कण्डिका ११ ॥ स आवतश्च परावतश्चान्वैक्षत, तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपतसमपतप्ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः शमित्यूर्ध्वमक्षरमुदक्रामत् । स य इच्छेत्सर्वाभि- रेताभिरावद्भिश्च परावद्भिश्च कुर्वीयेत्येतैर्यैव तं महाव्याहृत्या कुर्वीत सर्वाभिर्हं वा अस्यैताभिरावद्भिश्च परावद्भिश्च कृतं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतया महाव्याहृत्या कुरुते ॥ ११ ॥ कण्डिका ११ ॥ महाव्याहृति शम् ॥ ( सः ) वह [ परमात्मा ] ( आवतः ) पास वाली [ दिशाओं ] को ( च च ) ओर भी ( परावतः ) दूर वाली [ दिशाओं ] को ( अनु ऐक्षत ) देखन लगा । ( ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत् ) उनको वहां ही उसने सब ओर से दबाया. ( अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से तपाया, भली भांति तपाया । ( ताभ्य श्रान्ताभ्यः तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः ) उन दबाई हुई, तपाई हुई, भली भांति तपाई हुई से ( शम् ) शम् [ शान्ति वाला वा शान्तिकारक ब्रह्म है ] ( इति ऊर्ध्वम् ) यह ऊँचा [ उत्कृष्ट ] ( अक्षरम् ) अक्षर [ अविनाशी ब्रह्म शब्द ] ( उद् अक्रामत् ) निकल आया । ( सः यः इच्छेत् ) वह पुरुष जो चाहे ( एताभिः सर्वाभि ) इन सब ( आवद्भिः ) पास वाली ( च च ) और भी ( परावद्भिः ) दूर वाली [ दिशाओं ] से ( कुर्वीय इति ) मैं पुरुषार्थ करूँ-( तम् ) उस [ पुरुषार्थ ] को ( एतया एव महाव्याहृत्या ) इस ही महाव्याहृति [ शम् ] से ( कुर्वीत ) करे । ( अस्य ) उस [ पुरुष ] का ( एताभिः आवद्भिः च च परावद्भिः ) इन सब पास वाली ओर भी दूर वाली [ दिशाओं ] से ( ह वै ) अवश्य ही ( कृतम् ) कर्म ( भवति ) होता है ( यः एवं वेद ) जो व्यापक ब्रह्म को जानता है, ( च यः ) और जो ( एवं विद्वान् ) व्यापक ब्रह्म को जानता हुआ ( एवम् ) इस प्रकार से ( एतया महाव्याहृत्या ) इस महाव्याहृति [ शम् ] से ( कुरुते ) कर्म करता है ॥११॥ ११--( आवतः ) उपसर्गच्छन्दसि धात्वर्थे ( पा० ५ । १ । ११८ ) आङ् उपसर्गाद् धात्वर्थे वतिः । आगताः। समीपस्थाः दिशः ( परावतः ) पूर्वसूत्रेण परा--वतिः । परागताः दूरस्था दिशः ( शम् ) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ( पा० ३ । २ । ७५ ) शमु उपशमने-विच् । शांतिकारकं ब्रह्म ॥