भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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॥ अभावाधिकरणम् (चिन्मयशरीरविचारः) ॥ श्रीमद्बलदेवविद्याभूषणविरचिता अवतरणिका — सम्प्रति सूत्रकारः मुक्तजीवस्य चिन्मयशरीरवत्तां प्रदर्शयिष्यति। (हिन्दी अनुवाद: अब सूत्रकार यह दिखायेंगे कि मुक्त जीव का आध्यात्मिक/चिन्मय शरीर होता है।) संशयः — छान्दोग्योपनिषदि (८.१२.३) प्रतिपादितानुसारं परमपुरुषस्य भगवतः सान्निध्यं प्राप्तस्य मुक्तस्य जीवस्य किं चिन्मयशरीरमस्ति न वा? किमसौ यथेच्छं शरीरं ग्रहीतुं शक्नोति न वा? (हिन्दी अनुवाद: संशय: क्या छान्दोग्योपनिषद् (८.१२.३) में वर्णित परब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त मुक्त जीव का आध्यात्मिक शरीर होता है अथवा नहीं? क्या वह इच्छानुसार कोई भी शरीर धारण कर सकता है अथवा नहीं?) पूर्वपक्षः — अत्र बादरिमुनिः स्वमतमुपस्थापयति — (हिन्दी अनुवाद: पूर्वपक्ष: यहाँ बादरि मुनि अपना मत प्रकट करते हैं —) ब्रह्मसूत्रम् — अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ १० ॥ (अभावे बादरिराह ह्येवम्) पदच्छेदः तथा शब्दार्थः — अभावे (अभावम्) — शरीरादीनामभावे (शरीर आदि का अभाव); बादरिः — बादरिमुनिः (बादरि मुनि); आह — कथयति (कहते हैं); हि — यतः (क्योंकि); एवम् — एवं श्रूयते (ऐसा श्रुति में कहा गया है)। सूत्रार्थः — बादरि मुनि कहते हैं कि मुक्त आत्मा के शरीर का अभाव होता है, क्योंकि श्रुति में ऐसा ही कहा गया है। श्रीलबलदेवविद्याभूषणकृतं भाष्यम् — बादरिमुनेर्मते मुक्तजीवस्य शरीरं न विद्यते। शरीरं तदुपकरणानि च सर्वं पूर्वकर्मनिर्मितं भवति। (हिन्दी अनुवाद: बादरि मुनि का मत है कि मुक्त जीव का कोई शरीर नहीं होता। शरीर और उसके उपकरण पूर्वकर्मों द्वारा ही रचित होते हैं।) यतः सः सर्वकर्मभ्यो विमुक्तः, तस्मान्मुक्तजीवस्य शरीरं नास्ति। (हिन्दी अनुवाद: चूँकि वह समस्त पूर्व कर्मों से मुक्त हो चुका है, अतः मुक्त जीव का कोई शरीर नहीं होता।) कुत एतत्? सूत्रमाह — "आह ह्येवम्" (तथा हि श्रुतिराह)। अत्र 'हि' शब्दो हेतौ प्रयुक्तः। (हिन्दी अनुवाद: ऐसा क्यों है? सूत्र स्पष्ट करता है — "आह ह्येवम्" (क्योंकि ऐसा कहा गया है)। यहाँ 'हि' शब्द 'क्योंकि' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।) तथाहि छान्दोग्योपनिषदि (८.१२.१) श्रूयते — "न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति । अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥" (हिन्दी अनुवाद: जो शरीरयुक्त है, उसके सुख और दुःख (प्रिय और अप्रिय) का विनाश अथवा निवारण कदापि नहीं हो सकता। निश्चय ही अशरीरी (शरीररहित) अवस्था में स्थित पुरुष को प्रिय और अप्रिय कभी स्पर्श नहीं करते।)

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