भारतकोश
गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 78 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

प्रस्तावना

अपने ही हाथों अपना नाश!

अंग्रेज तो इस देश से चले गये, लेकिन जाने से पहले विश्वविद्यालयीन शिक्षा द्वारा हजारों देशी अंग्रेज उन्होंने तैयार कर दिये थे। इस देश की धरती पर निरंतर अपना स्वामित्व बनाए रखने के लिए इनके पास एक ही उपाय था कि 'देश की प्रजा को हर तरह से बर्बाद कर दो, और इसके लिए उनकी संस्कृति का सर्वनाश करो!'

यह कार्य यदि विदेशी लोग करने जाएं तो यहाँ की प्रजा क्रुद्ध होकर विप्लव कर बैठेगी, इसलिए इस देश के लोगों के हाथों ही इस सर्वनाश के कार्यक्रम पर अमल करवाना अनिवार्य था। इसलिए देशी अंग्रेजों को तैयार किया गया। आज तो इन उपाधिधारक (डिग्रीवाले) पश्चिम- परस्त देशी अंग्रेजों की संख्या लाखों-करोड़ो तक पहुँच गई है।

इन देशी अंग्रेजों ने जाने-अनजाने प्राप्त हुए शैक्षिक पश्चिमी उन्नाधिकारी के कारण संस्कृति के सभी क्षेत्रों के मूल पर आघात कर दिया है। मोक्षलक्ष्मी संस्कृत-वृक्ष से सभी अंगों को उन्होंने जड़ से हिला दिया है।

श्री वेणीशंकर मुरारजी वासु बताते हैं कि सांस्कृतिक तत्वों को पश्चिम-परस्त रहस्यमय और अनपढ़ नीति-रीति के वर्तमान वेग से भी नष्ट करने का कार्य चालू रखा जाए तो भारतीय प्रजा के सांस्कृतिक अस्तित्व की आयु शायद सौ-दौ सौ वर्ष से अधिक नहीं रहेगी।

श्री वासु की विचारधारा भारतीय प्रजा के किसी भी स्तर के नेताओं के रूप में गिने जानेवाले सभी भाईयों तक पहुँचे तो मुझे लगता है कि उनके मस्तिष्कों में विदेशी एजेण्टों ने जो गलत विचार भर दिए हैं, वे