भारतकोश
गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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कागज की कश्ती नदी में बहाने नहीं ले जाता कोई। छत पर चाँद दिखाने नहीं ले जाता कोई। लोरी गाकर नहीं सुलाता कोई। गुड़ का गर्म शीरा नहीं खिलाता कोई। न नानी की कहानियाए याद रहीं और दादाजी के भूने हुए चने खाने की आदत छूट गई। बच्चे समय की रफ़्तार से तेज भाग रहें हैं। बहुत तेज, अपने माँ-बाप की पकड़ से दूर।।

न्यूयार्क का अब्राहम लिंकन स्कूल

आज समस्त भारतीयों की नजर यूरोप-अमरीका की तरफ है। उनकी हर बात हम आंखे मूंद कर अपनाने को तैयार है। जिस प्रकार कस्तुरी मृग की नाभि में होती है, फिर भी मृग अज्ञानता के कारण उसे पाने के लिए इधर-उधर भटकता है। उसी प्रकार सारी व्यवस्थाएँ हमारी संस्कृति में मौजूद है, पर आँखे मूंद कर हम विदेशों की नकल करने में लगे हैं। मद्य, मांस, सेक्स , हिंसा के कुपरिणामों से त्रस्त होकर यूरोप-अमरीका के लोग शाकाहार, योग, अहिंसा, ध्यान आदि का मूल्य समझ कर उन्हें अपनाने का प्रयास कर रहे हैं। दुःख की बात यह है कि इन देशों के लोग जिन दुष्परिणामों को भुगत रहे हैं, उन्हें सारी बातों को फैशन के नाम पर हम अपनाने में गौरव अनुभव कर रहे हैं।

प्राचीन काल में हमारे वहाँ नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे। संसार के अनेक देशों के लोग हमारे यहाँ आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् विद्या (ज्ञान) वह है, जो हमें बंधनों से छुड़ा कर मुक्ति की ओर ले जाये। इस सुनहरे सूत्र पर हमारी शिक्षा आधारित थी। शिक्षा द्वारा व्यक्ति को संस्कार, करूणा, नैतिकता आदि प्राप्त होते हैं। आज शिक्षा द्वारा बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ पाकर मानव डॉक्टर, वकील, इंजीनियर बन गया है। लेकिन उसमें मानवता नदारद है। जीवन के अमूल्य 15 या 18 वर्ष शिक्षा के पीछे लगाकर जब वह शिथिल बनता है, तब शिक्षा अर्थउपार्जन