गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
कागज की कश्ती नदी में बहाने नहीं ले जाता कोई। छत पर चाँद दिखाने नहीं ले जाता कोई। लोरी गाकर नहीं सुलाता कोई। गुड़ का गर्म शीरा नहीं खिलाता कोई। न नानी की कहानियाए याद रहीं और दादाजी के भूने हुए चने खाने की आदत छूट गई। बच्चे समय की रफ़्तार से तेज भाग रहें हैं। बहुत तेज, अपने माँ-बाप की पकड़ से दूर।।
न्यूयार्क का अब्राहम लिंकन स्कूल
आज समस्त भारतीयों की नजर यूरोप-अमरीका की तरफ है। उनकी हर बात हम आंखे मूंद कर अपनाने को तैयार है। जिस प्रकार कस्तुरी मृग की नाभि में होती है, फिर भी मृग अज्ञानता के कारण उसे पाने के लिए इधर-उधर भटकता है। उसी प्रकार सारी व्यवस्थाएँ हमारी संस्कृति में मौजूद है, पर आँखे मूंद कर हम विदेशों की नकल करने में लगे हैं। मद्य, मांस, सेक्स , हिंसा के कुपरिणामों से त्रस्त होकर यूरोप-अमरीका के लोग शाकाहार, योग, अहिंसा, ध्यान आदि का मूल्य समझ कर उन्हें अपनाने का प्रयास कर रहे हैं। दुःख की बात यह है कि इन देशों के लोग जिन दुष्परिणामों को भुगत रहे हैं, उन्हें सारी बातों को फैशन के नाम पर हम अपनाने में गौरव अनुभव कर रहे हैं।
प्राचीन काल में हमारे वहाँ नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे। संसार के अनेक देशों के लोग हमारे यहाँ आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् विद्या (ज्ञान) वह है, जो हमें बंधनों से छुड़ा कर मुक्ति की ओर ले जाये। इस सुनहरे सूत्र पर हमारी शिक्षा आधारित थी। शिक्षा द्वारा व्यक्ति को संस्कार, करूणा, नैतिकता आदि प्राप्त होते हैं। आज शिक्षा द्वारा बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ पाकर मानव डॉक्टर, वकील, इंजीनियर बन गया है। लेकिन उसमें मानवता नदारद है। जीवन के अमूल्य 15 या 18 वर्ष शिक्षा के पीछे लगाकर जब वह शिथिल बनता है, तब शिक्षा अर्थउपार्जन
में कितनी उपयोगी होती हैं, यह सोचनेवाली बात हैं। वर्तमान शिक्षा ने हमारे सांस्कृतिक पर्यावरण को खूब विकृत किया है। आज मानवता ऑक्सिजन पर आखिरी सांस ले रही है। सरस्वती मंदिर आज अनाचार व दुराचार के अड्डे बन गये हैं। हमारी प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था एवं उसमें प्रदान की जाने वाली शिक्षा का त्याग कर हम नौकरी व अर्थ के लालच में अंग्रेजी बाबू बनने के चक्कर में पड़ गये हैं। शिक्षा-शक्तियों का स्पष्ट मत हैं कि बच्चों की बुद्धि का विकास मातृभाषा में शिक्षा के माध्यम से जितना अधिक हो सकता है, उतना अन्य भाषा के माध्यम से संभव नहीं है। फिर भी हम मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेजी भाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा की अंधी दौड़ में शामिल हो रहे हैं। इसके दुष्परिणाम सामने आने लग गये हैं। अभी भविष्य की कल्पना तो और अधिक भयावह हैं।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि न्यूयार्क (अमरीका) में अब्राहम लिंकन स्कूल प्रारंभ किया गया है, जिसका मुख्य कार्यालय लंदन में है। अन्य अनेक देशों में भी उसकी शाखाएँ प्रारंभ की गई हैं। वहाँ हमारी देवभाषा संस्कृत, प्रचीन गणित एवं तत्वज्ञान की शिक्षा दी जाती है। स्कूल-प्रबंधनने पांच वर्ष या उससे बड़ी उम्र के बच्चों को इस स्कूल में भेजने के लिए जनता से आग्रह किया है। उन्होंने कहा है कि अपने बच्चों को श्रेष्ठ, आदर्श स्वच्छ व प्रामाणिक नागरिक बनने के लिए हमारे स्कूल में भेजिए।
तत्संबंधी हमारा ध्यान इस ओर कब जायेगा, जब हम अपनी पुरानी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की ओर लौटेंगे। कम से कम अब न्यूयार्क के अब्राहम लिंकन स्कूल को देखकर तो हमें कुछ सोचना ही चाहिए। जितनी जल्दी हम इस ओर ध्यान दे पायेंगे, उतना ही लाभप्रद होगा।
-जे.के. संधवी
तूफान आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है....
आपके पास अपने बच्चों के लिए वक्त नहीं है। इससे ज्यादा खतरनाक बात यह है कि आपके बच्चों के पास बहुत ज्यादा वक्त हैं, जिसे आप अनदेखा कर रहे हैं। आपकी यह उदासीनता बरकरार रही, तो आपका और आपके परिवार का विनाश निश्चित है। तूफान आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है और उसकी दस्तक आप नहीं सुनना चाहते हैं तो फिर भगवान ही आपका
A black and white photograph of a man in a plaid shirt, looking down with his hands pressed against his forehead in a gesture of distress or despair.
मालिक हैं।
अतिरिक्त समय में आपके बच्चे क्या कर रहे हैं? चॉकलेट खा कर दाँत बिगाड़ रहे हैं, घंटों इंटरनेट के सामने बैठकर चेटिंग कर रहे हैं और अपनी आंखों की रोशनी गँवा रहे है।
आपके बच्चे मोबाईल पर संदेश भेजने के आदी हो चुके हैं। टाइम पास करने का यह जरिया उन्हें कैसर दे सकता है। शहर में कितने डिस्को है, कौन-सा डिस्को रात कितनी देर तक खुला रहता हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी है। दिन में खुले रहने वाले डिस्को में कम उम्र के लड़के-लड़कियों का जाना आम बात हैं, जिन्होंने अभी अपनी स्कूल की पढ़ाई भी पूरी नहीं की।
फास्ट फूड, फिल्मी गॉसिप, फैशन शो, पुल, और वीडियों गेम्स पार्लर, क्रिकेट, धूम्रपान, ड्रग्स इत्यादि आपके बच्चों की जिंदगी के अहम हिस्से बन चुके हैं। ये आपके बच्चों के सहज जीवन को समाप्त कर रहे हैं। रही-सही कसर टेलीविजन पूरा कर रहा है, जो चौबीसों घंटे आपके बच्चों के दिलो-दिमाग पर इस कदर छाया हुआ है कि वे एक तरह से टेलीविजन के दास बन गए
हैं। आपके बच्चे वही खाएंगे जो टेलीविजन कहेगा, वही पहनेंगे जो टेलीविजन चाहेगा, वहीं सोचेंगे जो टेलीविजन बोलेगा।
पश्चिमी अर्थशास्त्र की मान्यता है कि किसी समाज पर कब्जा करना हो तो, पहले उस समाज के बच्चों पर काबिज हो जाओ। देश तो अपने आप गुलाम हो जाएगा।
बच्चों को संस्कार दीजिए, संपत्ति नहीं...
बच्चों को संस्कार दीजिए, संपत्ति नहीं। बच्चों को नैसर्गिक भारतीय जीवन शैली में ढालना ही इसका एकमात्र उपाय है। मंदिर बनवाने से ज्यादा जरूरी है, बच्चों को मंदिर में जाने की पात्रता देना। वरना जिस तरह आज जीन्स और टाई पहन कर कृष्ण कन्हैया की आरती उतारने के दृश्य देखे जा सकते हैं, कल हमारे बच्चे कोकाकोला पीकर और बर्गर खाकर उपवास करेंगे और प्रसाद में अल्कोहलिक चॉकलेट देना घर की इज्जत का प्रतीक बन जाएगा।
संपत्ति बच्चों को बिगाड़ती है, संस्कार उन्हें सहज और नैसर्गिक जीवन जीने की ऊर्जा देते हैं। संपत्ति को भोगने की एक सीमा है, संस्कारों के साथ जीवन जीने के सुख अनंत हैं।
- नंदकिशोर राजगड़िया
आज तो जो विद्या की अर्थी उठा दे, वही विद्यार्थी...
बेरोजगारी का अंतिम पड़ाव अपराध है। अब तक यह माना जाता था कि अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग ही अपराध की ओर मुड़ते हैं। आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि आजकल पढ़े-लिखे लोगों का अपराध पर एकाधिकार हो गया है। फराटेंदार अंग्रेजी बोलने वाले माफिया गिरोहों में शामिल हो रहे हैं। सरकारी तंत्र का पढ़ा-लिखा तबका हर तरह के अपराध करने में सबसे आगे है।
A composite illustration. The top part shows a conveyor belt with several graduates in blue gowns and caps. The bottom part is a collage of educational symbols: a building labeled 'COLLEGE', a blue 'MBA' logo with silhouettes of people, a graduation cap with a red ribbon, the word 'EDUCATION', and a stack of books.
हिन्दुस्तान का अंगूठा छाप आदमी आज भी ईमानदारी से जीना चाहता है। जितना मिल जाए, उसी में गुजर-बसर करने को तैयार हैं।
शिक्षा का अर्थ तो यह होना चाहिए कि दूसरों के होठों की मुस्कराहट हमारी खुशी बने। हम विद्या और शिक्षा को पर्यायवाची न समझें। प्रशिक्षित तो हम पशु को भी कर सकते हैं, पर हम उसमें विवेक नहीं जगा सकते। यह विवेक ही मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाता है। विद्या जानना है जबकि शिक्षा सीखना। शिक्षा ली जाती है, विद्या अर्जित की जाती है। हमें आज के विद्यार्थियों को विद्या के साथ-साथ शिक्षा भी देनी है। आज तो जो विद्या की अर्थी उठा दे, वही विद्यार्थी।
-अनंत श्रीमाली (कवि, व्यंग्यकार और मंच संचालक)
भाषा अंग्रेजों की! शिक्षा अंग्रेजों की
अंग्रेजी राज में पिंडारियों और ठगों ने मिलकर जितना हिन्दुस्तान लूटा होगा, उससे ज्यादा माल तो आज मात्र एक वर्ष में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने मुनाफे के रूप में ले जाती हैं।
कौन कह सकता है कि अंग्रेज चले गए हैं? हमारे उठने, बैठने, सांस लेने, जीने की हर गतिविधि में अंग्रेज मौजूद है। कोई ऐसे ही थोड़े चला जाता है, अपने को छोड़कर?
कहाँ नहीं है, अंग्रेज? काला कोट पहन कर अदालत में मौजूद है। नीली वर्दी पहने हुए थाने में मौजूद हैं। लिप्टन की चुसकियाँ लेता हुआ हर दीवानखाने में मौजूद हैं।
मैंने हर बार उसे संसद में बजट पेश करते हुए देखा है। लंबा चोंगा पहन कर दीक्षांत-समारोहों में खातकों को डिग्रियाँ बाँटते हुए देखा है। सात-घोड़ों की बग्गी में सवार होकर गणतंत्र दिवस की परेड में सलामी लेते हुए देखा हैं।
घोड़ों की तरह हिनहिनाता हुआ रेसकार्स में मौजूद हैं अंग्रेज। वह विल्स की नेम-प्लेट चिपकाए हवा में बल्ला लहराता हुआ क्रिकेट के मैदान में मौजूद हैं। इत्कालीस दिसंबर की रात को नशे में धुत कभी पोप, कभी भांगड़ा करता हुआ हर सड़क पर मौजूद है।
अंग्रेज हर चुंगी नाके पर जजिया बसूल रहा है। फॉरिस्ट ऑफिसर की हैसियत से आदिवासियों पर लठियां बरसा रहा है। मंदिरों को मस्जिदों से लड़ाता है। किंगफिशर की एक बोतल पर रॉक संगीत का कैसेट मुफ्त दे रहा है। बेटियों और बहनों को लेडी डायना की लाइफ स्टाइल परोस रहा है।
संविधान अंग्रेजों का, संसदीय लोकतंत्र अंग्रेजों का, कानून अंग्रेजों का, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था अंग्रेजों की, शिक्षा-प्रणाली अंग्रेजों की, भाषा अंग्रेजों की! मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इतिहास में एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब आपको असली और खानदानी अंग्रेजी सिर्फ हिन्दुस्तान में मिलेंगे, इंग्लैण्ड में नहीं।
-अक्षय जैन
ऐसे माँ-बाप, माँ-बाप कम दुश्मन ज्यादा होते हैं....
जीवन संस्कारों से सजता व संवरता है। पढी हुई शिक्षा तो भूली जा सकती है, लेकिन संस्कार जीवन पर्यन्त के पाथेय होते हैं। संस्कारहीन व्यक्ति दरिद्र ही नहीं होता, वह जीवन भर दुःख और तकलीफ भी भोगता है। सुसंस्कार सुरक्षा कवच हैं, जो मनुष्य के यात्रापथ को निरापथ बनाता है। पालक और बालक यदि सुसंस्कृत, धार्मिक और सभ्य हैं, तो धर्म, समाज और राष्ट्र का बहुमुखी विकास अवश्यभावी है। बालकों के संस्कार-निर्वाण में अभिवाचक भी कम जवाबदेह नहीं हैं। यदि माँ-बाप खुद संस्कारों के शिकार हैं, तो वे अपनी संतति से क्या अपेक्षा रख सकते हैं? ऐसे माँ-बाप, माँ-बाप कम, दुश्मन ज्यादा होते हैं।
माँ-बाप का बेटे के प्रति कर्तव्य है कि वे अपनी संतान को इतना सुयोग्य बना दे कि सत्पुरुषों सज्जनों की सभा में वह अग्रिम पंक्ति में बैठने कि पात्रता रखें और बेटे का माँ-बाप के प्रति कर्तव्य वह है कि वह ऐसा जीवन जिये, जिससे हर आदमी उसके माँ-बाप से पूछे कि तुमने किस पुण्य कर्म के उदय से ऐसा सुपुत्र पाया हैं। माँ किसी बेटे कि जागीर नहीं होती और संस्कारों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। पुत्र को जन्म देने मात्र से स्त्री माँ नहीं हो जाती और कोई पुरुष बाप नहीं हो जाता। माँ-बाप को अपनी संतान के प्रति उनके क्या-क्या कर्तव्य और दायित्व हैं, यह ज्ञान भी होना चाहिए।।
नाट्य कलाएं, संगीत, नृत्य, चित्रकला, साहित्य की विभिन्न विद्याएँ, कला के अलग-अलग रूप हैं और कलाएँ इंसान को संस्कारित करती है, उसे संवारती है, उसे पशु होने से बचाती है, उसके जीवन में संतुलन रखती है। मगर कलाकर्म के इस मर्म को पीछे धकेल कर व्यवसाय कर्म से जोड़ दिया जाये, तो जो नतीजे आने चाहिए वे आज की कटु मगर चिंताजनक सच्चाई हैं।
-मुनि श्री प्रसन्न सागरजी
भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गए?
1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकाले ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने वहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा अधिकारी था Thomas Munro दोनों ने अलग-अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। 1823 के आस-पास की बात है। Litnar जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा था कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है, और उस समय जब भारत
में इतनी साधरता थी और मैकॉले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी 'देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था' को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह 'अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था' लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे और मैकॉले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा हैं – 'जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।' इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता, जो समाज की तरफ से होती थी, वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम-घूम कर खत्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला।
1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे '7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में 'Higher Learning Institute' हुआ करते थे, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलकर चलाते थे, न कि राजा, महाराजा।
इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। किन्तु सारे गुरुकुलों को खत्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे 'फ्री स्कूल'
कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी, बम्बई यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के जमाने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।
मैकॉले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी, बहुत मशहूर चिट्ठी है वो। उसमें वो लिखता है कि, ‘इन कॉन्वेंट स्कूलों में ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे। जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।’ उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ-साफ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती हैं, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे! हम तो खुद हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आती हैं, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा। लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है किन्तु दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर यह कैसे अंतराष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं, दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी, वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, वहाँ का सारा काम फ्रेंच में होता है। जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है, उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकॉले की रणनीति थी।
अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा लूट मचाने वाली मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए सेल्समैन तैयार कर रही हैं।
वैश्वीकरण और बेहिसाब आयात के कारण लाखों छोटे और माध्यम दर्जे के उद्योग एवं कारखाने बंद हो गए हैं। न तो नौकरियाँ है और न ही रोजगार के अवसर। स्वास्थ्य आम आदमी के हाथ से निकल गया हैं।
यह कहना कि अंग्रेजी जानने से सुबह उठते ही नौकरी मिल जाएगी या रोजगार में आप हेनरी फोर्ड का दर्जा हासिल कर लेंगे, आत्मच्छलना के सिवा कुछ नहीं है। जिस देश की आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती हो, वहाँ इन्फोसिस की सफलता को आदर्श के रूप में पेश करना मानसिक दिवालियापन का सबूत हैं। सिर्फ अंग्रेजी के सहारे न तो आप चुनाव जीत सकते हैं और न ही फिल्मों या सीरियल में कामयाब हो सकते हैं।
हिन्दुस्तान के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में क्या हो रहा है? मल्टीनेशनल कम्पनियाँ बच्चों को मुक्त केडबरी खिला रही हैं, जिसमें कीड़ा होता है। बच्चों को फिल्म दिखाकर आदी बनाया जा रहा हैं कि कोलगेट इस्तेमाल नहीं करोगे, तो मुहँ के सारे दाँत गिर जाएँगे। अब यह बताना जरुरी नहीं है कि कोलगेट में जानवरों की हड्डियों का चूर्ण मिलाया जाता हैं। हद तो तब हो गई जब एक विदेशी कंपनी द्वारा लड़कियों में नेपकिन बाँटे गए।
पूरी प्राथमिक शिक्षा विश्व बैंक चला रही हैं
आप जब अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भेजते हैं, तो उसे विदेशी संस्कृति का गुलाम बना देते हैं। वह बार्डबल के बारे में ज्यादा जानता है, मैकडोनाल्ड में जाने के लिए बैचेन रहता है और डनहिल के कश लगाना अपनी शान समझता है। थोड़ा बड़ा होने पर शुरू होते हैं – इंटरनेट पर चेटिंग, दिन में खुले रहने वाले डिस्को में मस्ती, मांसाहारी खान-पान की ओर झुकाव। आप अनजाने में अपने बच्चों पर एक ऐसी लाईफ स्टाइल थोप देते हैं, जो नैसर्गिक नियमों के खिलाफ हैं।
A black and white illustration showing six silhouettes of people walking in a group. Each person has a square icon on their head representing a different social media platform: Facebook (f), Twitter (bird), a group of people icon, YouTube (red play button), LinkedIn (in), and a checkmark icon. The icons are colored blue, light blue, white, red, blue, and blue respectively.
अपनी भाषा को छोड़ने का अर्थ है- अपने धर्म, अपनी परम्पराओं और अपने नैसर्गिक जीवन से विमुख होना। एक दिलचस्प उदाहरण देना चाहूँगा। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाला बच्चा दिन में कम-से-कम बीस बार एक शब्द जरूर बोलता है – ‘ओह, शीट!’ शीट का अर्थ होता है विछा, यानी टट्टी। हृदय तो तब हो गयी जब मंदिर में टाइट पेंट पहने एक लड़की अर्चना के लिए झुक नहीं पाई तो उसके मुँह से बरबस निकल पड़ा – ओह, शीट!!
बुनियादी सवाल मौजूदा व्यवस्था को बदलने का हैं।
अंग्रेजी भाषा का ज्ञान और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा प्रणाली, दो अलग-अलग चीजे हैं। कोई अंग्रेजी सीख कर कंप्यूटर पर महारत हासिल करना चाहता है, तो यह उसका निजी चुनाव है। शिक्षा का जिस तरह से
व्यापारीकरण हो रहा हैं, उससे वह स्पष्ट है कि यूरोप और अमेरिका को भारत के बाजार पर कब्जा जमाने के लिए नए दलालों और गुलामों की सख्त जरूरत है। अंग्रेजी माध्यम की तालीम लूट मचाने वाली मल्टीनेशनल कम्पनियों के लिए सैलसमैन तैयार कर रही है। पूरी प्राथमिक शिक्षा को विश्व बैंक चला रही है। बुनियादी सवाल मौजूदा व्यवस्था को बदलने का है।
आई.आई. टी., प्रोफेशनल्स के एक ग्रुप ने मुझे भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था। क्वालिटी के मुद्दे पर मेरा कहना था – ‘हमारे बच्चों के मुकाबले यूरोप के बच्चे बेहद खूबसूरत, गोरे-चिट्ठे और हष्ट-पुष्ट होते हैं। क्या अपने बच्चों की क्वालिटी सुधारने के लिए यूरोप के मदों को हम बुलाना पंसद करेंगे? ऐसी स्पर्धा में शामिल होने का क्या तुक हैं, जो हमें हमारी पहचान से बेदखल कर दें?’
अंग्रेजी सीखने वाला बच्चा स्मार्ट इंटेलीजेन्ट और एक्टिव होता है, ऐसी मान्यता धोखाधड़ी का पर्याय हैं। हमें अपनी औकात से रूबरू होना चाहिए। हम जैसे हैं, उसे स्वीकार करना ही हमारे जीवन का आनंद है। जिसे अपनी भाषा और रीति-रिवाजों और अपने पुरखों से मिलें जीवन-मूल्यों पर गर्व होगा, वही स्वाभिमान से जी सकता है। अपने बच्चों को अमेरिकन या यूरोपीयन बनाने के मोह से बचाइये।
-अक्षय जैन
स्कूल में बाजार....
अब वक्त आ गया है, जब हमें अपने बारे में सोचना चाहिए। क्या अपने समय का थोड़ा हिस्सा हर रोज अपने बारे में सोचने के लिए नहीं निकाल सकते? क्या हमें इस बात पर नहीं सोचना चाहिए कि हमारे बच्चों के साथ स्कूलों में क्या हो रहा हैं?
आईसक्रीम बनाने वाली एक कंपनी स्कूलों में एक इनामी प्रतियोगिता आयोजित करती है। जो बच्चा प्रमोटर कंपनी की आइसक्रीम के
ज्यादा से ज्यादा रैपर इकट्ठा कर सकता है, उसे कैमरा या कॉमिक्स इनाम में दिया जाता है। मुंबई के किसी मशहूर रेस्टोरेंट में किसी प्रसिद्ध कार्टून चरित्र के साथ लंच या डिनर का इंतजाम भी हैं।
टूथपेस्ट बनाने वाली एक कंपनी स्कूलों में एक फिल्म दिखाती है। बच्चों को बताया जाता है कि दांत कैसे खराब होते हैं। फिर यह बताया जाता है कि उनके द्वारा बनाई हुई टूथपेस्ट से दांत कितने सुरक्षित रहते हैं। कितने ज्यादा मजबूत हो जाते हैं। हर बच्चे को कोलगेट की एक ट्यूब मुफ्त में दी जाती है।
A green school bag with a yellow zipper and a green handle. The bag is open, revealing various school supplies: a yellow notebook with a cartoon face, a spiral-bound notebook, a red apple with a face, a yellow ruler, a pair of orange scissors, and several pencils in different colors (yellow, orange, green, blue). The bag is set against a plain white background.
बाजार की गिरफ्त से अब तक स्कूल बचे थे। अब वे भी इस बाजार की लपेट में आ गये हैं। बाजार पर कब्जा मल्टीनेशनल कंपनियों का है। मकसद और निष्कर्ष दोनों साफ हैं। बच्चों को एक ऐसी दुनिया में धकेला जा रहा है, जिसमें वे कुछ खास उत्पादों के आदी और गुलाम हो जाएं।
कालेज डे मल्टीनेशनल कंपनियाँ स्पॉंसर कर रही हैं। आइसक्रीम, टूथपेस्ट से लेकर कोल्ड ड्रिंक्स नूडल्स और पिज्जा की मार्केटिंग के लिए बच्चों को टारगेट बनाया जा रहा है। जंक फूड को मासूमों के कंधों पर लादने के लिए मल्टीनेशनल कंपनियाँ उनके क्लास रूम तक पीछा कर रही है। हेपेटाइटिस के टीके से लेकर फन पार्क या 'जेल पेन' के प्रचार के लिए हमारे मासूम बच्चे इस्तेमाल किये जा रहे हैं।
अगर बच्चे आपके हाथ से निकल गए, तो समझिए
आपका सब कुछ नष्ट हो गया।
इसीलिए मैं कहता हूँ कि थोड़ा सा समय निकालिए और ठंडे दिमाग से सोचिए। स्कूलों के संचालकों और प्रधानाचार्यों पर मुकदमा ठोकिए, मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराईये या अखबारों में विरोध करिए। आपके बच्चों की परवरिश का अधिकार आपका है। आप बच्चों की पढ़ाई की फीस अदा करते हैं। वह आपका हक बनता है कि स्कूलों में आपका बच्चों के साथ खेलवाड़ न हो।
जिस देश में गुरुकुल की परम्परा रही हो, विद्यालयों को ज्ञान मंदिर माना जाता रहा हो, सरस्वती की पूजा की जाती हो, वहाँ कारपोरेट जगत के दलालों के प्रवेश पर पांबदी लगनी चाहिए। कालेजों और स्कूलों के प्रबंधको कोइस बात की चेतावनी दी जानी चाहिए कि वे चंद पैसें की खातिर बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य को दांव पर नहीं लगा सकते।
बाजार आपकी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सकता, तो यह कोशिश जरूर कीजिए कि बाजार आपको अपना गुलाम भी न बना सके। अगर बच्चे आपके हाथ से निकल गए, तो समझिए आपका सब कुछ नष्ट हो गया।
पढ़-लिख करके क्या करेगा
ओ मूर्ख नादान
मैं इस देश के लोगो को आज तक समझ नहीं पाया। कोई काम सलीके से नहीं करते। एक चपरासी की नौकरी के लिए पाँच हजार स्नातक लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं। जिस देश ने शून्य का अविष्कार किया, उस देश के लोग झाड़ू लगाने के लिए मारकाट पर उतारू हो जाएँ, तो इससे बड़ा क्रूर मजाक और क्या हो सकता है?
हमारे यहाँ सरस्वती की पूजा होती है। हमारे पास दुर्लभ ज्ञान विज्ञान के खजाने हैं, उपलब्धियाँ गिनाने जाएं, तो खत्म होने का नाम न लें। जो देश सोने की चिड़िया कहलाने वाला था, वहाँ चपरासी की एक अदद नौकरी अराजकता के दृश्य पैदा कर दे तो विश्व बैंक यकीनन हमें कर्ज देना बंद कर देंगे।
हर काम का एक सलीका होता है। अगर झाड़ू ही लगाना था, तो कॉलेज में पढ़ने ही क्यों गए? हैरत की बात तो यह है कि देश में एक भी विश्व विद्यालय ऐसा नहीं हैं, जहाँ एक कुशल चपरासी बनने के लिए कोई पाठ्यक्रम चलाया जाता हो। साहित्य में एम.ए. करने के बाद चपरासी की नौकरी करनी पड़े तो किस कदर अफरा-तफरी मच जाएगी, यह सोचकर ही मेरी रुह कांप जाती है। चपरासियों के रूतबे में कमी आएगी और साहित्य में चपरासियों की मोनोपोली हो जाएगी।
जो पढ़े-लिखे नहीं है, उनका भविष्य उज्ज्वल है। आप पढ़े लिखे नहीं हैं तो फिल्मों में चले जाइए। किसी जमाने ऐसी सीख दी जाती था – ‘पढ़-लिख कर के क्या करेगा, ओ मूरख नादान, अपनी किस्मत आजमा, जाके फिलिमस्तान’।। या फिर आप राजनीति में चले जाइए। एक बिना पढ़ी-लिखी औरत बिहार की मुख्यमंत्री बन सकती है।
ऐसी शिक्षा-प्रणाली को छोड़ने का समय आ गया है, जो हर साल लाखों बेकारों को पैदा करती है। अगर इस देश के नवजवान की नियति चपरासी बनना है, तो यही सही। यह लोकतंत्र की विफलता है या सरकार की अक्षमता, इस पर 68 सालों के बाद अब बहस करने से कोई फायदा नहीं है। हाँ, यह कबूल करने का वक्त जरूर आ गया है कि हमें अपने परम्परागत हुनर वाले कामों को फिर से अपनाना है। स्वरोजगार के लिए सीबीएससी या आईसीएससी में दखिला लेने की जरूरत नहीं।
-ले.अक्षय जैन
यह बच्चा आपका कैसे हो गया?
जो बच्चा जन्म ले रहा है, वह आपका नहीं हो सकता। गर्माधान से ही माँ को विलायती दवाईयाँ खानी पड़ती है। बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए खाने-पीने का सारा सामान विदेशी कंपनियों का होता है। जूते फ्रांस से आए, खिलौने जापान के हों और कपड़े तो भई इंग्लैण्ड के बने हैं। वह जन्मदिन ही कैसा, जिसमें मोमबत्तियां न बुझाई जाएं और अंडा से बना केक न काटा जाए। प्लेगुप और नर्सरी से शुरू होने वाली यह लिस्ट इतनी लम्बी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। क्या अब भी आप यह कहने की हिम्मत करेंगे कि ‘यह बच्चा आपका है?’ माँ-बाप भारतीय हो सकते हैं, लेकिन बच्चा भी भारतीय है, यह कौन कह सकता है?
वेंटीलेटर पर हिन्दी
हिन्दी आई.सी.यू. में भर्ती है। जब भी सितम्बर में हिन्दी दिवस आता है, उसे वेंटीलेटर पर रख दिया जाता है, ताकि सरकार जनता को यह एहसास करा सके कि हिन्दी अभी जिंदा है, हिन्दी मरी नहीं है। आत्म छलना का यह सालाना जश्न पिछले साठ सालों से जारी हैं।
उसे क्या कहा जाए? राष्ट्रीय शर्म या अंग्रेजों की गुलामी?
- • यदि मैं तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा दिया जाना बंद कर देता। सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएँ अपनाने को मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते उन्हें बर्खास्त कर देता। -गांधी जी
- • मुझे लगता है कि जब हमारी संसद बनेगी, तब हमें फौजदारी कानून में एक धारा जुड़वाने का आन्दोलन करना पड़ेगा। यदि
दो व्यक्ति भारत की एक भाषा जानते हों और इस पर भी उनमें से कोई दूसरे को अंग्रेजी में पत्र लिखे ये एक-दूसरे से अंग्रेजी में बोले तो उसे कम से कम छः महीने की सख्त सजा दी जाएगी।।
-गांधी जी
(‘स्वभाषा लाओ, अंग्रेजी हटाओ’ पुस्तक से साभार)
जो शिक्षा हमें अच्छे-बुरे का भेद करना और अच्छे को ग्रहण करना तथा बुरे का त्याग करना नहीं सिखाती, वह शिक्षा सच्ची शिक्षा नहीं है।
-गांधी जी
जब मैं राष्ट्रपति बनकर यहाँ आया तो हिंदी, उर्दू और गुरुमुखी के अखबार पढ़ने की इच्छा हुई, लेकिन ये अखबार मुझे नहीं मिले। मुझसे यह कहा गया कि राष्ट्रपति भवन में केवल अंग्रेजी के अखबार आते हैं। मुझे बहुत तकलीफ हुई। आजाद भारत में राष्ट्रपति भवन में जब भारतीय भाषाओं का कोई स्थान नहीं तो देश की एकता कैसे रह सकती है?
-पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह
कम पढ़े तो गाँव छोड़ दे, ज्यादा पढ़े तो देश छोड़ दे।
अमेरिका से लौटते समय पत्रकारों ने स्वामी विवेकानंद से पूछा- ‘अमेरिका की अमीरी देखने के बाद गरीबी से त्रस्त भारत के बारे में आप क्या सोचते हैं?’ स्वामीजी का जवाब इतिहास में अंकित हो गया – ‘अब तक मैं अपने देश की इज्जत करता था, लेकिन अब पूजा करूँगा।
गुरुकुल की शिक्षा जीवन-विज्ञान से जुड़ी थी। या यूं कहें कि मात्र जीवन का वैज्ञानिक स्वरूप ही विद्यार्थियों को सिखाया जाता
था। राजपुत्रों से लेकर सामान्य परिवारों की संतानों के साथ प्रशिक्षण और अनुशासन पालन में कोई भेदभाव नहीं होता था। राजपुत्रों से लेकर सामान्य परिवारों की संतानों के साथ प्रशिक्षण और अनुशासन पालन में कोई भेदभाव नहीं होता था। खेती करना, गाय पालना, अपना भोजन स्वयं तैयार करना, जंगलों से लकड़ियाँ काट कर लाना, कुटिया लीपना या धोती-दुपट्टा पहन कर नंगे पैर घूमना, सूर्य नमस्कार करना, शिक्षा की बुनियादी बातें थीं। इस शिक्षा ने अभिमन्यु, लव-कुश, श्रवणकुमार और चाणक्य पैदा किए। महावीर और गौतमबुद्ध दिए। विवेकानंद और दयानंद सरस्वती बनाए।
आज तो यह हाल है कि जो कम पढ़ लिख लेता है, वह गाँव छोड़ देता है, ज्यादा पढ़-लिख लेता है, वह देश छोड़ देता है।
आज का लाड़ला बच्चा.....
पहले समय पर उठते थे, बड़ों को नमन करते थे। मुख से राम-राम कहते थे, पढ़ते भी थे और खेतों खलियानों और घरों में खट के काम करते थे। समय पर खाते थे, खेलते थे और समय पर आराम करते थे। अब उठते हैं देर से उठते ही शिकवे करते हैं ढेर से।