गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपढ़-लिख करके क्या करेगा
ओ मूर्ख नादान
मैं इस देश के लोगो को आज तक समझ नहीं पाया। कोई काम सलीके से नहीं करते। एक चपरासी की नौकरी के लिए पाँच हजार स्नातक लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं। जिस देश ने शून्य का अविष्कार किया, उस देश के लोग झाड़ू लगाने के लिए मारकाट पर उतारू हो जाएँ, तो इससे बड़ा क्रूर मजाक और क्या हो सकता है?
हमारे यहाँ सरस्वती की पूजा होती है। हमारे पास दुर्लभ ज्ञान विज्ञान के खजाने हैं, उपलब्धियाँ गिनाने जाएं, तो खत्म होने का नाम न लें। जो देश सोने की चिड़िया कहलाने वाला था, वहाँ चपरासी की एक अदद नौकरी अराजकता के दृश्य पैदा कर दे तो विश्व बैंक यकीनन हमें कर्ज देना बंद कर देंगे।
हर काम का एक सलीका होता है। अगर झाड़ू ही लगाना था, तो कॉलेज में पढ़ने ही क्यों गए? हैरत की बात तो यह है कि देश में एक भी विश्व विद्यालय ऐसा नहीं हैं, जहाँ एक कुशल चपरासी बनने के लिए कोई पाठ्यक्रम चलाया जाता हो। साहित्य में एम.ए. करने के बाद चपरासी की नौकरी करनी पड़े तो किस कदर अफरा-तफरी मच जाएगी, यह सोचकर ही मेरी रुह कांप जाती है। चपरासियों के रूतबे में कमी आएगी और साहित्य में चपरासियों की मोनोपोली हो जाएगी।