गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 78 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो पढ़े-लिखे नहीं है, उनका भविष्य उज्ज्वल है। आप पढ़े लिखे नहीं हैं तो फिल्मों में चले जाइए। किसी जमाने ऐसी सीख दी जाती था – ‘पढ़-लिख कर के क्या करेगा, ओ मूरख नादान, अपनी किस्मत आजमा, जाके फिलिमस्तान’।। या फिर आप राजनीति में चले जाइए। एक बिना पढ़ी-लिखी औरत बिहार की मुख्यमंत्री बन सकती है।
ऐसी शिक्षा-प्रणाली को छोड़ने का समय आ गया है, जो हर साल लाखों बेकारों को पैदा करती है। अगर इस देश के नवजवान की नियति चपरासी बनना है, तो यही सही। यह लोकतंत्र की विफलता है या सरकार की अक्षमता, इस पर 68 सालों के बाद अब बहस करने से कोई फायदा नहीं है। हाँ, यह कबूल करने का वक्त जरूर आ गया है कि हमें अपने परम्परागत हुनर वाले कामों को फिर से अपनाना है। स्वरोजगार के लिए सीबीएससी या आईसीएससी में दखिला लेने की जरूरत नहीं।
-ले.अक्षय जैन
यह बच्चा आपका कैसे हो गया?
जो बच्चा जन्म ले रहा है, वह आपका नहीं हो सकता। गर्माधान से ही माँ को विलायती दवाईयाँ खानी पड़ती है। बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए खाने-पीने का सारा सामान विदेशी कंपनियों का होता है। जूते फ्रांस से आए, खिलौने जापान के हों और कपड़े तो भई इंग्लैण्ड के बने हैं। वह जन्मदिन ही कैसा, जिसमें मोमबत्तियां न बुझाई जाएं और अंडा से बना केक न काटा जाए। प्लेगुप और नर्सरी से शुरू होने वाली यह लिस्ट इतनी लम्बी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। क्या अब भी आप यह कहने की हिम्मत करेंगे कि ‘यह बच्चा आपका है?’ माँ-बाप भारतीय हो सकते हैं, लेकिन बच्चा भी भारतीय है, यह कौन कह सकता है?