हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ हम्मीररासो समीप स्वामि संकरं, गणेशयं सुधं करं । धरौ सुसीस हथ्थयं, प्रभू¹ सदा समथ्थयं ॥ ७७ ॥ दोहरा छंद प्रसन भए ऋषि पद्म तब, अस्तुति सुनत प्रमाँन² । जैत राज यहिँ थल करो, राव राखि सिव ध्याँन ॥ ७८ ॥ हर प्रसन्न भय राव पहँ, मुनिबर पद्म प्रसाद । मिले भील-कुल सकल तहँ, हरषित मिटे बिषाद् ॥ ७९ ॥ छंद पद्धरी ऋषिराज पद्म आज्ञा सुपाय । नृप जैत मित्र मंत्रिय बुलाय ॥ बड़ वणिक गणक कोबिद सुजाँन । तिन पुच्छि मंत्र वास्तव प्रमाँन ॥ ८० ॥ सुभ दिए मुहूरत नीब हेत । रणथंभ नाँम औ गढ़ समेत ॥ सव ग्यारह सै दस बरष और । सुइ संबत बिक्रम कहत मौर ॥ ८१ ॥ इषु अर्द्ध अरंगा को प्रसिद्ध । रबि अयन सौम्य जान्यौ प्रसिद्ध ॥ सत्र कला पाँच जानो सुइष्ट । त्रिय पुरुष लग्न गढ़ कीन इष्ट ॥ ८२ ॥ गत इक अंस वृषभाँनु जानि । ससि बेद् सार्द्ध मिथुनेस मानि ॥ तृन अंस वृस्चिक कै इलानंद । ससि बीस³ नंद अज अंस मंद ॥ ८३ ॥ १ प्रभु सदा सर्थयं । २ अमाँन । ३ अंश । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri