हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १३ परसराँम अवतार भौ१, हरन सकल भुव-भार । जैत राव तिहिं बंस मैं, जन्म्यौ परम उदार ॥ ७१ ॥ छप्पय छंद जैत राव चहुवाँन सकल बिद्याजुत सोहै। दाँन कृपाँन बिधाँन अखिल भूपति मन मोहै॥ अमित थाट रजपूत बंस छत्तीस अमानो। सूर बीर उद्दार२ बिरद बंदी जु बखानो ॥ दिन प्रत्ति तेज बड्ढिय३ नृपति, सत्रु संक निसि दिन रहैं। बिस्सलह४ भूप अवतंस भुव, अरथिन् मिलि दारिद दहँै ॥७२॥ इक्क समय आखेट, राव खेलन बन आए५ । सकल सुभट थट संग, बीर बानै जु बनाए ॥ लखव६ इक्क बाराह, बाजि पिच्छै नृप दिन्निव । रहे७ संग तैं दूरि, सध्य बिन राव सु किन्निब ॥ बन बिखम वंक भूधर बिरह, सुथल पदम भव तप करत । मृग त्यागि भागि मिल्ले सुऋषि, बंदि चरण सचा धरत ॥७३॥ छंद लघुनाराच करे प्रणाम रावयं, सुदिन्न पद्म पावयं । उभै सुपाणि जोरि कै, बिनै सु कीन कोरि कै ॥ ७४ ॥ खुले सुभाग्य मोरयं, लह्यो दरस तोरयं । अखंड जोग भूपयं, नमः सजीव मोखयं* ॥ ७५ ॥ त्रिकाल ज्ञान धाँमयं, रटंत नाँम राँमयं । समस्त योग धाँमयं, त्रिलोक पूर काँमयं ॥ ७६ ॥ १ भयौ । २ उदार । ३ बढ़तो, बड्डिग । ४ बीसलह । ५ आयउ, बनायउ । ६ लखिव । ७ रह्यउ ।
- मोखयं—मोक्ष ।