हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
DevanagariHindipublished258 पृष्ठ
पृष्ठ 98, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 98
१२ हम्मीररासो कर खग¹ धनुष कटि लसै तोनि ॥ ६३ ॥ कर जोरि ब्रह्म सों कह्यौ धाय । मैं करूँ कहा लोकेस आय ॥ जब कह्यौ कमलभू सुनहु तात । भृगुनाथ कहैं सुइ करो बात ॥ ६४ ॥ भृगुनाथ कही खल हनूँ धाय । सँग सक्ति दइय नृप कै सहाय ॥ दसबाहू उग्र आयुध बिसाल । आरूढ़ सिंह उर² कमल माल ॥ ६५ ॥ मुनिदेव मिले अभिसेष कीन । नृप अनल नाँम कह तासु दीन ॥ नृप कियौ जुद्ध तिनतैं अखंड । हनि जंत्रकेत करि खंड खंड ॥ ६६ ॥ हनि धूम्रकेत जो सक्ति आय । नृप हरष सहित परसे सुपाय ॥ बहु दैत्य नृपति मारे अपार । उठि चली खेत तैं रुहिर³ धार ॥ ६७ ॥ उबरे सु गए पाताललोक । भय दनुजहीन सब मृत्युलोक⁴ ॥ ६८ ॥ दोहरा छंद आसा पूरण सबन की, करी सक्ति तिहिं बार । याही तैं आसापुरा, धरयौ नाँम निरधार ॥ ६६ ॥ चहुवाँनन⁵ कै वंस मैं, परम इष्ट कुलदेवि । सकल मनोरथ सिधि तहाँ, पूजत पावै सेवि⁶ ॥ ७० ॥
१ खड्ग । २ गला। ३ रुधिर धार । ४ मर्त्यलोक । ५ चाहुव्वान। ६ देव, सेव—अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri