हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ११ तब चतुरानन जज्ञ थल, कियौ तुरत वह दूरि ॥ ५६ ॥ आबू गिरि अग्नेव दिसि, चायस्थल सब आय। आराधे तिहिं फरस धरि, आए सीघ्र सुभाय ॥ ५७ ॥ कमलासन ब्रह्मा भए, होता भृगु मुनि कीन। आचारज वासिष्ठ भौ, ऋत्वज बत्स प्रचीन ॥ ५८ ॥ परसराँम जजमाँन करि, होम करन मुनि लाग। महासक्ति आराधि करि, अनलकुंड पटि¹ जाग ॥ ५९ ॥ छंद पद्धरी विधि करी² परसधर, बोलि ठौर। जजमाँन कियउ भृगुकुल सुमौर ॥ वरदेव सक्ति आराधि ताँम । चहुँ वेद वदन उच्चार जाँम ॥ ६० ॥ निज वारि कमंडल अग्नि सींच । रज संख पानि होमे स वीच ॥ चहुँ³ वेद मंत्र-बल सक्ति पाय । तब अग्नि रूप प्रगटे सुभाय ॥ ६१ ॥ उत्तंग अंग सुचि तेज-धाँम । झलहलत कांति तन प्रभा काँम ॥ भलहलत मुकट भ्रुकुटी करूर* । पलहलत नेत्र आरक्त मूर ॥ ६२ ॥ हलहलत दनुज वह त्रास मानि । भुज च्यारि दिग्घ⁴ आयुध सजानि⁵॥ जम जज्ञ पुरुष प्रगटे अजौनि । १ पदि । २ करे फरसधर । ३ चउ । ४ दोर्घ । ५ मान जान— अंत्यानुप्रास । *करूर (सं० कुरुल)—मस्तक पर बिखरी बाल की लट ।