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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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२८ हम्मीररासो मुख मीँडत$^१$ अंजन गहि दिन्नौ । जग्यौ काँम ऋषि काँम सु भिन्नौ ॥१५६॥ लाख मुसक्यानि भई मति भोरी । जीति सरस$^२$ ऋषि काँमनि हेरी ॥१५७॥ ——— अथ तुलसीदास पूर्व पक्ष$^३$ दोहरा छंद का नहिं पावक जरि सकै, का न समुद्र समाय । का न करै अबला प्रबल, किहिं$^४$ जग काल न खाय ॥१५८॥ कबि लखन$^५$ अबला कहत, सबला जोध कहंत । दुर्बिला$^६$ तन मैं प्रगट जिहिं, मोहत संत असंत$^७$ ॥१५६॥ जीति सिसिर बित्तिय$^८$ तबै, फिरि आयव ऋतुराज । मिले उर्बसी पद्म ऋषि, सरे सक्र के काज ॥१६०॥ बिवस भए$^९$ मुनि अच्छरा$^{१०}$, भुलिय तप व्रत नेम । निसि बासर क्रीड़ा करत$^{११}$, वढ्यौ जु तन मन प्रेम ॥१६१॥ सुरति बढ़ी चित मैं चढ़ी, मढ़ी मोह मति भूरि । छिन छिन तिय ऋषि रजत$^{१२}$ दोउ, भयउ$^{१३}$ प्रेम परिपूरि ॥१६२॥ हृदय पुरंदर त्रास गनि, गइय$^{१४}$ उर्वसी त्यागि । बिन माया ऋषिराज तब, मन सुत्तो$^{१५}$ सो जागि$^{१६}$ ॥१६३॥ जाय जुहारे इंद्र कौ, काँम उर्वसी संग । कज्ज$^{१७}$ सँबारयौ रावरौ, करयौ कठिन तप भंग ॥१६४॥ —————————— १ माडत । २ ससिर । ३ अथ तुलसीदास रामायने पूरब पच्छि । ४ को । ५ लाखन । ६ द्विर्बिला, द्रुबिला । ७ अनंत । ८ बीती । ६ भयौ । १० अच्छरिय । ११ करै । १२ राज । १३ भरे । १४ गई । १५ सोवत सो । १६ लागि । १७ काज । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri