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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

हम्मीररासो २९ ( बचनिका ) बार्त्तिक तब इन्द्र कामादिक कौ सत्कार कियौ । यहाँ ऋषि पद्म सूतो सो जाग्यौ । मन महँ बिचार करन लाग्यौ । मैं तो माया मैं पाग्यौ तप खोयौ औ कलंक लाग्यौ । और अब दोनों गईंँ तपस्या तो खंडित भई, अरु उर्वसी हू जात रही अब यातैँ यह सरीर राखनो योग्य नहीं और मन की बासना भौत ठौर भई तातैं एक सरीर सूँ कछू बनि आवै नही । जब ऋषि होम करि सरीर त्यागौ । जहाँ जहाँ बासना रही तहाँ तहाँ१ पाग्यौ ॥ दोहरा छंद तिय बियोग ऋषि तन तज्यौ, ग्यारा सै चालीस । माघ सुक्ल द्वादसि सु तिथि, बार बरनि रजनीस ॥१६५॥ छंद पद्धरी तन पात किन्न ऋषि पदूम आप । उर्वसी बिरह तन मन सु ताप ॥ ग्यारा सौ चालोस जानि । नृप बिक्रम संबत. ताहिं मानि ॥१६६॥ तप२ सिद्धि मास अरु बहुत पच्छि । ऋतु सिसिर द्वादसी तिथि सु रच्छि ॥ सिवबार सोम जान्यौ प्रसिद्ध । जित प्रीति योग बिच३ करन अद्ध ॥१६७॥ रबि अयन४ अंस अठ बीस मानि । ससि जन्म त्रियोदस अंस जानि ॥ सुध मीन लग्न बिगृह सु त्यागि । करि हवन जवन सुख हृदय पागि ॥१६८॥ १ ही । २ तपसि । ३ बिव । ४ एण । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri