हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० हम्मीररासो निजं प्रथम अंग पंचांग होम । जित रही बासना सरस धोम X ॥ ऋषि मुद्गल गोती सिखाहीन । वहि तिलक हृदय आयौ नवीन ॥१६९॥ सिर भयौ पृथ्वीपति जवन ईस । जिहिं राज्य करचौ १ पूरण दिलीस ॥ वह रहौ तिलकै दिय परि अनूप । तहँ भौ २ हमीर चहुवाँन भूप ॥१७०॥ दोउ बाद कर्म्म किन्नौ सु चाहि । दोउ भए भीर महिमा सु साहि ॥ अरु लग्न उर्वसी चरन संग । यह भए पंच ऋषि पद्म अंग ॥१७१॥ ( वचनिका ) वार्तिक ऋषि पद्म उर्वसी को बिरह तन त्याग्यौ । माह सुक्ल १२ द्वादसी सोमवार आद्रा नक्षत्र प्रीति योग बवकर्ण, सूर्य्य २८ अठाईस, चंद्रमा मिथुन को तेरा १३ अंस, मीन लग्न मैं देह होमी । पाँच अंग होम्याँ जितनी बासना जितनी जायग हुई । ताहीं सों पाँच स्वरूप एक सरीर का हुवा ॥ ❖ अथ राव हम्मीर को जन्म ३ वर्णन दोहरा छंद ससि बेद् रुद्र संबत गिनो, अंग खाअ षित साक । दक्षण अयन सु सरत ऋतु, उपजे गए न नाक ॥१७२॥ १ करयउ । २ भयौ । ३ जन्म समयो, जन्म समय्यो । X धोम=धूम्र । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri