भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

३० हम्मीररासो निजं प्रथम अंग पंचांग होम । जित रही बासना सरस धोम X ॥ ऋषि मुद्गल गोती सिखाहीन । वहि तिलक हृदय आयौ नवीन ॥१६९॥ सिर भयौ पृथ्वीपति जवन ईस । जिहिं राज्य करचौ १ पूरण दिलीस ॥ वह रहौ तिलकै दिय परि अनूप । तहँ भौ २ हमीर चहुवाँन भूप ॥१७०॥ दोउ बाद कर्म्म किन्नौ सु चाहि । दोउ भए भीर महिमा सु साहि ॥ अरु लग्न उर्वसी चरन संग । यह भए पंच ऋषि पद्म अंग ॥१७१॥ ( वचनिका ) वार्तिक ऋषि पद्म उर्वसी को बिरह तन त्याग्यौ । माह सुक्ल १२ द्वादसी सोमवार आद्रा नक्षत्र प्रीति योग बवकर्ण, सूर्य्य २८ अठाईस, चंद्रमा मिथुन को तेरा १३ अंस, मीन लग्न मैं देह होमी । पाँच अंग होम्याँ जितनी बासना जितनी जायग हुई । ताहीं सों पाँच स्वरूप एक सरीर का हुवा ॥ ❖ अथ राव हम्मीर को जन्म ३ वर्णन दोहरा छंद ससि बेद् रुद्र संबत गिनो, अंग खाअ षित साक । दक्षण अयन सु सरत ऋतु, उपजे गए न नाक ॥१७२॥ १ करयउ । २ भयौ । ३ जन्म समयो, जन्म समय्यो । X धोम=धूम्र । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri