भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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३४ हम्मीररासो अथ हम्मीरराव को और अलाउद्दीन पातसाह को बैर समय्यो बर्णन दोहा इक्क¹ समय पातसाह बन, मृगया कहि मन किन्न² । सबै खाँन उमराव चढ़ि, हय गय बृंद सु लिन्न³ ॥ १८८ ॥ हरम सबै पतसाह को, जो सिकार के जोग । साज बाज बनि बनि सकल, अरु अंदर के लोग ॥ १८६ ॥ सुंदरता सुकुमार निधि, वहै अपछरा अंग⁴ । ताके गुन गन तैँ बँध्यौ, निमिष न छाँड़त⁵ संग ॥ १६० ॥ छंद भुजंगप्रयात चले साह आखेट⁶ बज्जे निसाँनं । सबै भूप सथ्थं सुपथ्थं⁷ सुजाँनं ॥ सजे डंबरं अंबरं साज बाजं । बनी पख्खरं बाजि सांजं समाजं ॥ १६१ ॥ किते बीर बाने अमाने अपारं । किते मीर धीरं सजे सार धारं ॥ नफीरी बजी भेरि बज्जे रवहं । वहै उर्वसी संग लिन्नी समहं ॥ १६२ ॥ जके रूप सौं साह बंध्यौ सुजाँनं । जथा चंद्र की कांति चकोर माँनं ॥ जथा पंकजं⁸ वै दुरैफैं लुभाए । तथा साह बंध्यौ सनेहं सुभाए ॥ १६३ ॥

१ एक। २ कीन। ३ लीन। ४ अच्छरी अंग। ५ छंडहिं। ६ आलादि (अलाउद्दीन)। ७ समत्थं सुखाँनं। ८ पंकजं पै दुरैफै लुभाए।