हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ३९ सीत भीत ता ना मिटी, कही हुरम यह गत्थ ॥२१७॥ पुच्छिय महिमा-साहि तब, को तू आप बताय । मैं घरनी पतिसाह की, रूपबिचित्रा नाय ॥२१८॥ जलक्रीड़ा हम करत सब, आयौ पौन प्रचंड । तब डेरन को भजि चलीं, तामैं मेघ सुमंड ॥२१९॥ भयौ भयानक तिमिर बन, सबै संत्थ गय भूल । मै इकली वन महँ यहाँ, डरति फिरति दुख मूल ॥२२०॥ छप्पय छंद तब महिमा कर जोरि हुरम कूँ सीस नवायौ१ । चढ़यौ अस्व की पिठ्ठि दैव पहुँचाव सुभायौ ॥ कहै हुरम सुन सेख देह कंपत है मोरी । छिनक बैठि यहिं ठौर सरन मैं लिन्नी (लीनी) तोरी । कहै सेख यह बीत नहिं, तुम साहिब मैं दास तुव । यह धरम नाहिं उलटी कहो, सरन सदा सेवक सुमुव ॥२२१॥ सेख समो पहिचानि स्वामि सेवग न बिचारौ । काम रूप तुम पुरुष बीर बानैत उदारौ ॥ बहुत काल अभिलाष रही जिय मैं यह भारी । कौन समो वह होय मिलै महिमा गुनबारी ॥ सुइ करिय आज साहिब सहल, सकल मनोरथ सिद्ध हुव । दै योग भोग संयोग यह, कौन दोस जग देहु तुव ॥२२२॥ चौपाई छंद कहै सेख तुम बेगम सच्चिय । ऐसी बात कहो मति कच्चिय ॥ मैं अब लों तिय जग मैं जानत । भगनी मात .सुत। सम माँनत ॥२२३॥ १ हुरम कहि कहि सन बोयौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri