हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० हम्मीररासो ता महिं तुम हजरत की बाला । सब कै एक वहै हकताला ॥ तातैं कहा धर्म मैं हारूँ । यह तो कबहुँ जिय न बिचारूँ ॥२२४॥ सुनहु सेख बेगम तिय सबहीं । तुम हूँ धर्म्म सुन्यौ है कबही ॥ तिय तजि लाज कहत रति जाचन । को नहिं धर्म जो पुरुष अराचन ॥२२५॥ तन मन धन जाचे तैं दिज्जिय । कह कुराँन पूरन सोइ किज्जिय१ ॥ पुरुष धर्म यह मूर न होई । तिय जाचत कौ नाटत कोई ॥२२६॥ सोरठा छंद तब जिय सोचि बिचारि, मनहीं मन महिमा समुझि । साँची है यह नारि, धर्म उभै जग महँ प्रगट ॥२२७॥ तब महिमा मुसकाय, कर गहि आलिंगन दियौ । इक तरु कौं तर जाय, दियौ तुरंगम बंधि तब ॥२२८॥ जीनपोस तर डारि, सस्त्र खुल्लि रखिय निकट । करी सुमार सुमार, उत्कंठा तिय मिलन की ॥२२६॥ छप्पय छंद महा मोद मन बढ़्यौ परस्पर तन मन फुल्लिव । मिटिव बंक मन संक निसँक ह्वै आसन भुल्लिव ॥ मानो कोक चकोर चंद लब्भव रबि लंबे । घन दामिनि मनु मिलिय काँम रति पति सुख फंवे ॥ १ दीजे, कीजे ( अंत्यानुप्रास ) CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri