हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ४१ दुहुँ ओर सोर स्वातिक सुभो, गाढ़ो आलिंगन दियव । नख खंड नाहिं परसे सरहिं, सकल कोक केली कियव ॥२३०॥ अंग अंग बिनअंग* रंग बड्डिव दुहुँ ओरन । कढिव बिरह तन ताप परस्पर बर सत मोरन ॥ हाव भाव रति अंग मुदित बर्षत अभिलाषै । करत कटाक्ष प्रकास बैन मधुरै मुख भाषै ॥ गहि अंग संग आसन दियव, कोक कला रस विस्तरिव१। आनंद द्वंद उन्माद जुत, काँम विवस दोउन भयव ॥२३१॥ तिहिं छिन इक मृगराज आनि तत्काल सुगज्जिव । प्रज्वलित नयन प्रचंड चँवर सिर उप्पर सज्जिव ॥ बिकट दंत मुख त्रिकट वाहु नख बिकट सुरंज्जै । तिहिं भय वन कै जीव सबै गजराज सुभज्जै ॥ आवत्त देखि तिहिं सिंह कौ, ह्वै सभीति तिय इम कहै । विधि कौन समै यह का भई, दैव बारि मैं बपु दहै ॥२३२॥ तब तिय कंपि सभीति उछरि महिमा गर लगिय । हे प्राणेश्वर कहा भई रसगत जु उमगिय ॥ तजहु भजहु अब वेगि, बचहु अब प्राण उबारो । मैं अब पलटे प्राण तजौं, तुम पर तन वारौं ॥ मुसकाय मीर तब यों कहैं, न डरि न डरि अबला सुभुव । तुट्टै जु आब रख्खों भुज न, कहा स्याल डर डरत तुव ॥२३३॥ छंद अर्द्धनाराच गहे कमाँन बाँनयं, धरंत ताहिं पाँनयं । तज्यौ न बाल आसनं, गह्यौ सरं सरासनं ॥२३४॥ १ विध्यरिव । २ प्रफुलित ।
- बिनअंग=अनंग । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri