हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ हम्मीररासो सु सिद्धि राग बागयं, ढए स धीर पागयं । कह्यौ हँकारि त्राचयं, सम्हारि स्वाँन साचयं ॥२३५॥ करी सुगुज्ज पुंजयं, उठ्यौं सु क्रोध गुंजयं । धरत्थौ सु चौर सीसयं, भुजा उठाय रीसयं ॥२३६॥ जथा सुक्रोध कालयं, उठ्यौ सु सिंह वालयं । करं कमाँन लिन्नयं, कसी सतानि¹ दिन्नयं ॥२३७॥ लग्यौ सुबाण मन्थयं, लखी अकत्थ गत्थयं । लग्यौ सुबाण पार भौ, गिरद्यौ सु सिंह स्यार भौ ॥२३८॥ दोहरा छंद सिंह मारि इक बाण तैं, भू मैँ दिन्नौ डारि । फिरि कमान तिहिं हथ्थ² तैं, धरी जु भूपर धारि ॥२३९॥ यहु साहस किन्नौ प्रगट, सम स्वभाव सम बुद्धि । गर्व हर्ष हिय नहिं कछू, प्रगटिय प्रेम प्रसिद्ध ॥२४०॥ मिलत मिलत मुसकात मृदु, कंपत हर्षंत गात । उचकनि लचकनि मसकिबो, सीकर हूकर बात ॥२४१॥ कवित्त छंद कंचन लता सी थहरात अंग अंग मिलि, सीकर समूह अंग अंगनि मैं दरसै । चुंबन कपोल नैन खंडन अधर नख, गहत पयोधर प्रचंड पानि परसै ॥ आनँद उमंगन मैं मुसकात बाल तुत- रात बतरात सतराअत रस बरसै । लपटनि झपटनि मसकनि अनेक अंग, रति रंग जंग तैं अनंग रंग सरसै ॥२४२॥ ———————————————————————————————— १ तान । २ हाथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri