हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ९१ उठे दुहुँ बीर कही यह गत्थ ॥ चढ़े चतुरंग कियौ तन कोप। मनौं अरुनोदय भाँन सु ओप१ ॥५१५॥ बजे रणतूर सु भेरि रबद्द । भए पढ़ गोमुख बीर सु सह ॥ चढ़े कुँवरेस तबै चतुरंग । बढ्यौ हिय हर्ष करै रणरंग ॥५१६॥ कहै तब खाँन सु बाल्हन सीह । करे सफजंग अबैदल२ वीह ॥ रतन कुमार रखो गढ़ ओर। नरव्वल ग्वालिर ओर चितोर३ ॥५१७॥ नठै तब अन्न करो सफजंग । तजो मति टेक लरो४ अनभंग ॥ असो सुनि बैन हमीर सुभाय । भरे५ जल नैन रहे मुरझाय ॥५१८॥ कही६ तब कौर नहीं थिर कोय । चले गिर मेरु नहीं थिर सोय ॥ मिले सुरलोक ससोक सकौन । सुनी यह राव रहे गहि मौन ॥५१६॥ गए रणवास जहाँ दोउ७ बीर। कियौ परणाम जुहार सुधीर ॥ सवै८ रणवास भरे जल नैन । कही९ तद् आसमती यह बैन ॥५२०॥ करो तुम१० उछछह हैं यह बार । १ चढ़ तन नूर वढ़ मुख ओर । २ अबद्दल । ३ औ चित्तोर ४ लरो न अभंग। ५ ढरे । ६ कहे । ७ दुव । ८ सबै । ६ कहे । १० बहु। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri