हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ९३ करे सु जुहार हमीरहिं ध्याय¹ । करो यह बात² परस्सि³ सुपाय ॥ मिले भव आनि⁴ सुनो चहुवाँन । करै कल रीति तजै नहिं बाँन ॥५२७॥ तजो⁵ धन धाँम रु लोभ सु⁶ मोह । धरो⁷ मनु टेक सरन्न सुजोह ॥ इती कहि सीस नवाय हमीर । कियौ रणथंभहिं वंदन⁸ धीर ॥५२८॥ चले सन्मुख उभै कुमरेस । सजे चतुरंग तनय करि रेस ॥ जहाँ पतिसाह अलावदि और । चली⁹ बर बीरति¹⁰ बाँधि¹¹ सुमौर ॥५२९॥ दोहरा छंद करि असुवारी कुमर दोउ, उतरे पौलि सु आए । डेरा करे उछाहजुत, बजि नोबति नीसाण¹² ॥५३०॥ सुणि नोबति के नाद¹³ तब, बहु उछाह गढ़ जाँन । तब अलावदी हसम दिसि, चाहत भयौ निर्धा(दा)न ॥५३१॥ बोलि खाँन सुलतान तब¹⁴, मसलति करी जु¹⁵ साहि । गढ़ मैं कहा उछाह अति, कहा (कौन) सबब यह आहि ॥५३२॥ हैं यह राव हमीर के, लघु भय्या¹⁶ के पूत । लरन काज¹⁷ इन सेहरो, सिर बाँध्यौ¹⁸ मजबूत ॥५३३॥ भय संक पतिसाह¹९ उर, कीनौ²⁰ बहुत बिचार । १ करे जहाँ राव हमीरहिं ध्याम ( धाम ) । २ बत्त । ३ पस्ति । ४ मिलै भव आन । ५ तजै । ६ रु । ७ धरै । ८ चंदन । ६ चले, चढ़े । १० बीरसु । ११ बंधि । १२ अप्रमाण । १३ नद । १४ सब । १५ सु । १६ भ्राता । १७ कज । १८ बंध्यौ । १६ अति । २० किन्नौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri