हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ हम्मीररासो। जौ न सिंह के मुख चढ़ै, सो भिल्लै इन सार ॥५३४॥ चौपाई छंद कहै वजीर साह सुनि बत्तं । मीर अरब्बिय¹ जानि सु तत्तं ॥ मर्कट बदन² सूकर सम³ काँनं । द्रग मंजार बेसू खल जाँनं⁴ ॥५३५॥ तुम⁵ साँमत प्रथिराज सु अग्गैं । गढ़ गज्जनि आए⁶ गहि खग्गैं ॥ तुमहिं दिली के तख्त बसाए⁷ । गौरीसा कै भए सहाए ॥५३६॥ वै⁸ दोउ कुमर पकरि अब लावैं । सन्मुख होइ तो⁹ मारि गिरावैं¹⁰ ॥ सुनि वजीर के बचन सुहाए । मीर जमालखाँन बुलवाए¹¹ ॥५३७॥ कहै साह सुनि मीर जमालं । है यह काम तुम्हारे हालं ॥ आगै¹² तुम गहियो प्रथिराजं । त्यों¹³ तुम गहो कुँमर दोउ आजं ॥५३८॥ छप्पय छंद सुणि जमाल खाँ मीर हत्थ¹⁴ धरि मुच्छ सँवारिय¹⁵ । पाव परसि कर जोरि कवन बड़ काज¹⁶ निहारिय¹⁷ ॥ १ अरबी । २ मुख । ३ सुक्कर इव । ४ द्रगमजार बपुष (कू) खल जानं (जानहु) । ५ तिहिं सामत । ६ गजनी लाये । ७ बैसाये, बठाये । ८ वैदुव कुँमर पकरि गहि ल्याऊँ । ६ तोयसो । १० गिराऊँ । ११ बुल्लाए । १२ अग्गै । १३ तिम । १४ हाथ । १५ बकारिय । १६ कज । १७ निकारिय । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri