हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ९५ जौ आयस अनुसरों सकल हिंदुव गहि लाऊँ । सम्मुख गहूँ¹ जुसार मागि तिहिं धूरि मिलाऊँ ॥ इम² कहि सलाँम कीनी ³तुरत सज्ज⁴ सथ्थ सब५ अप्पवल । सजि कवच टोप कर खग्ग गहि उभै ओर किन्निय सुलह⁶ ॥५३६॥ भुजंगप्रयात छंद इतैं कुमर⁷ चत्रंग⁸ कै जंग जुट्टे । उतैँ मीर आरब्ब कै बीर छुट्टे ॥ दुहूँ ओर घोरं निसाँनं सु बज्जं । मनौ पावसं मेघ घोरं सु गज्जं ॥५४०॥ दुहूँ ओर खंडं प्रचंडं सुभारी । छुटे नाल गोला बँदूकं सुभारी ॥ भयौ सोर घोरं धुँवा घोर घोरं । गई सुद्धि सुज्झै नहीं⁹ नैन ओरं ॥५४१॥ करैँ सेल खेलं महाबीर वंके । फुटैँ अंग अंगं करैँ दोय हंके ॥ बहैं तेग अंगं करैँ दुक१० दोई११ । हँसी कालिका देखि १२कौतुक सोई १३ ॥५४२॥ बहैं १४ जम्म दंड्ढं करैँ बाहु जोरं । कढैँ१५ अंत अंतं १६ कहूँ सीस तोरं ॥ कहूँ हथ्थ मथ्थं परे बीर बंके १७ । उठैं रुंड मुंडं करैँ जोर हंके १८ ॥५४३॥ १ गहूँ । २ यह । ३ किन्नी । ४ सजे । ५ सह । ६ बजे सुबीर सिंदुर, (सिंधुर) बदन उभै ओर किन्निय (कीनी, कीन्ही) सुलह । ७ कौर । ८ चतुरंग । ६ मही । १० टूक । ११ दोऊ । १२ दिक्खि, पिक्खि । १३ सोऊ । १४ चहैं । १५ गहैं । १६ अंतैं । १७ बक्के । १८ हक्के ।