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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

१०० हम्मीररासो छंद त्रोटक रणधीर चढ़े करि कोप मनं । सब सामँत सूर सजे अपनं ॥ गजराजन उप्पर डंबरयं । उछले¹ लगिं बीर सु अंवरयं ॥५६३॥ . बहु चंचल बाजि सु बग्ग² लियं । किय अग्ग³ सु पैदल लाग कियं ॥ गढ़ तैँ बहु भाँति⁴ सु तोप चली । पतिसाह⁵ समेत सु कोप चली ॥५६४॥ रणधीर सु बंधन⁶ दुग्ग⁷ कियं । करि मंगल बिप्रन दाँन दियं ॥ रबि कौ परणाम सु कीन⁸ तबै । कर जोरि सु आयसु माँगि९ जबै ॥५६५॥ अरु राव हमीर जुहार कियं । हर्षे¹⁰ चहुवाँन सु मोद हियं¹¹ ॥ बहु दुंदभि ढोल सुभेरि बजै । कसि आयुध सायुध बीर सजे ॥५६६॥ हलका करि बीर बढ़ै दल पैँ¹² । मनु राघव कोपि कियौ खल पैँ¹³ ॥ उत साहि हुकम्म कियौ रिस मैँ । सब सेन जु आय जुरयौ छिन मैँ¹४ ॥५६७॥ बिफरे सब बीर सुधीर मनं । सब स्वामि सु धर्म्म सु कीन¹५ पनं ॥


१ उससे । २ बाग । ३ अग्र । ४ भाँतिन । ५ पतिसाहि सुसैन सुकंप हली । ६ वंदन । ७ दुर्ग । ८ किन्न । ६ मंगि । १० वरखे । ११ दियं, जियं । १२ मैं । १३ पल मैं । १४ जुर्यौ निस मैं । १५ किन्न । . CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri