भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

हम्मीररासो १०३ अरि बत्थ सु हत्थ पछारि बलं । हिय पार कटार किये सु खलं ॥५७९॥ लख एक स रूमिय खेत परे । रणधीर सुरंड भरे खपरे ॥५८०॥ चौपाई छंद पर्यौ खेत बकसी बड़ भारी । और संग दल बीस हजारी ॥ मीर पचास संग तहँ सूते । इक लख रूमि बिहस्त¹ पहूँचे² ॥५८१॥ तीस सहस रणधीर सु³ संगी । परे खेत बर बीर उमंगी ॥ धीर⁴ रुंड द्वै पहर सु नच्यौ । एक सहस हनि गज जस संच्यौ ॥५८२॥ टूट्यौ गढ़ सु छाड़ि कौं सोई । सुनी श्रवण हम्मीर सु जोई ॥ तब आपन तन मन पन जान्यौ । छत्री मंगल मरन बखान्यौ ॥५८३॥ दोहरा छंद पक्ख ऊजरो⁵ चैत्र सुद्धि, तिथि नौमी सनिबार । बीस सहस छत्री परे, अबला जरीं हज़ार ॥ ५८४ ॥ जो कनवज काकै करी, करी छाड़ि रणधीर । हरष सोच सम करि दोऊ, चक्रत भए⁶ जु मीर ॥ ५८५ ॥ गज इकसठि दो लष तुरी, छप्परि⁷ बीस अमीर । जो कहता सोई करी, धन्य राव रणधीर ॥ ५८६ ॥ १ मिस्ति । २ पहुंचे । ३ कै । ४ धीर जुद्ध करि रुंड न नच्यौ । ५ पाख उजारी । ६ भयउ । ७ छपरि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri