हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १०३ अरि बत्थ सु हत्थ पछारि बलं । हिय पार कटार किये सु खलं ॥५७९॥ लख एक स रूमिय खेत परे । रणधीर सुरंड भरे खपरे ॥५८०॥ चौपाई छंद पर्यौ खेत बकसी बड़ भारी । और संग दल बीस हजारी ॥ मीर पचास संग तहँ सूते । इक लख रूमि बिहस्त¹ पहूँचे² ॥५८१॥ तीस सहस रणधीर सु³ संगी । परे खेत बर बीर उमंगी ॥ धीर⁴ रुंड द्वै पहर सु नच्यौ । एक सहस हनि गज जस संच्यौ ॥५८२॥ टूट्यौ गढ़ सु छाड़ि कौं सोई । सुनी श्रवण हम्मीर सु जोई ॥ तब आपन तन मन पन जान्यौ । छत्री मंगल मरन बखान्यौ ॥५८३॥ दोहरा छंद पक्ख ऊजरो⁵ चैत्र सुद्धि, तिथि नौमी सनिबार । बीस सहस छत्री परे, अबला जरीं हज़ार ॥ ५८४ ॥ जो कनवज काकै करी, करी छाड़ि रणधीर । हरष सोच सम करि दोऊ, चक्रत भए⁶ जु मीर ॥ ५८५ ॥ गज इकसठि दो लष तुरी, छप्परि⁷ बीस अमीर । जो कहता सोई करी, धन्य राव रणधीर ॥ ५८६ ॥ १ मिस्ति । २ पहुंचे । ३ कै । ४ धीर जुद्ध करि रुंड न नच्यौ । ५ पाख उजारी । ६ भयउ । ७ छपरि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri