हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ हम्मीररासो छप्पय छंद इते मीर रण परे साहि षट मास सम्हारे । तबै दूत इक आय साहि सौँ बचन उच्चारे ॥ जिते देव हिंदवाँन डिंगत को धीर बँधावै । जिनकौ पूजन करै राव निस दिन मन लावै ॥ बर दियव राव हम्मीर कौं आपन मुख संकर सरिस । टूटै न गढ़ढ रणथम्भ सुनि अभै किये चौदह बरिस ॥५८७॥ दोहरा छंद दल लख, सत्ताइस तहाँ, धर(न)नि समावत मीर । सूखत १ सर सरिता बिमल, कूप बावरी नीर ॥५८८॥ तिथि नौमी आसोज सुदि, कर गहि तेग रिसाइ । सुरमंदिर करि कोप सब, चढ़ढि २ अलावदि साइ ॥५८९॥ हाथ जोरि गन्नेस कूँ, कहै राव हम्मीर । करो मदति चाहत जवन, अलादीन दलभीर ॥५९०॥ चौपाई छंद सुनत ३ बचन हमीर कै सोई । कोपे ४ जुद्ध देव कौं जोई ॥ जब संकर काली हरषानी । निज ५ समाज बोले मृदु बानी ॥ ५९१ ॥ चोंसठि जोगनि भैरव नच्चैं । कर धरि चक्र त्रिसूल सु रच्चैं ॥ बाजे ६ डिमरु बीर चढ़ि ७ आए । तबै साहि सौँ जंग रचाए ॥ ५९२ ॥ १ सुक्रत । २ चढब्यव । ३ सुन तब बत्त राव की सोई । ४ कुप्पिय देव जुद्ध कौं जोई । ५ निज मुख सुबुल्यिय मृदु वानी । ६ बजिय, बजिवं । ७ जुरि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri