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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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हम्मीररासो १०५ चल्लै चक्र त्रिसूल सु नेजा। सक्ति पास धनु बाँन घरेजा ॥ हल मूसल अंकुस मुद्गर बर। परिघ सेल लै धाए परिकर ॥ ५६३ ॥ कीनौ जुद्ध बीर सब सज्जे। संकर सरस कतूहल¹ सज्जै ॥ सबै साहि की सैन सुभाई। सबै परस्पर करैँ लराई ॥ ५६४ ॥ बजि बाजंत्र अनेक स बीरं। डैरव संख भेरि पट हीरं ॥ मार मार चहुँ दिस सुनि बानी। कटे लाख² आल्हन पुर जानी ॥ ५६५॥ छप्पय छंद तब सब देव गणेश बिघ्न बड़ दल मैं किन्नव। कितौ म्लेच्छ को संग सब्र अप अप्पसु³ किन्निव ॥ उठे सकल ललकारि कीन्ह घमसाँन⁴ सुभारिय। रुंड मुंड परि दंड सेन दो लक्ख संघारिय ॥ देखंत नयन पतसाह तब अति अद्भुत कौतुक भयउ। हिम्मत बहादुर अली पर उभै लक्ख सेनह हयउ ॥५६६॥ यह चरित्र लखि साहि कूँच⁵ आल्हनपुर⁶ तैँ करि। तब फिर पलटे आय घेरि रणथम्भ सरिस भरि ॥ करि देवन से दोष कहो कौने सुख पाए। आगे⁷ लख दल किते मारि हरि असुर खिपाए।

१ कुतूहल। २ लक्ख अल्हन। ३ आपस मैं। ४ घमसाण। ५ कुच्च। ६ अल्हणपुर। ७ अग्नै। १२-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri