हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ हम्मीररासो अब लरै मनुस मानुसन सोँ देव दैत्य आगे१ किते। यह जानि साहि सिर नाय करि आय२ किए३ डेरा उते ॥५६७॥ दोहरा छंद हठ४ हमीर छाड़ै नहीं, हजरति तजै५ न टेक। सात मीर पतसाह कै, गए बिसरि करि टेक॥५६८॥ महरम खाँ तब इम कही, अब पछितावति साहि। हम बरजत रणथम्भ गढ़, चढ़ि आए तुम चाहि६ ॥५९९॥ हजरति हिमति न छाड़िये, धरिये मन मैं धीर। गढ़ नरगह चहुँ दिसि करो, कब लग लरै हमीर ॥६००॥ पद्धरी छंद महरम्म आपनो७ तजि सुसाहि। ध्याए सुदेव हिंदवाँन जाहि॥ बहु बोलि विप्र पूजा कराहिं। करि धूप दीप आरति बनाहिं८ ॥६०१॥ पद परसे दरसे सकल देव। नैवेद्य पुज्य नाना सु भेव॥ करं जोरि साहि बंदन सुकीन९। यह भाँति गवन डेरा सु लीन१० ॥६०२॥ करि आल्हण११ पुर तैँ कूँच ध्याय। रण कै पहार डेरा कराय॥ गढ़ की निगाह कीनी१२ सु साहि। आसंग नाहिं कीनी१३ सताहि॥६०३॥ करि मंत्र एलची दिय पठाय। १ अगैँ। २ आनि। ३ किन्न, कियउ, किते। ४ हट्ठ हमीर न छंडही। ५ तजी। ६ साहि। ७ अप्पनो। ८ कराय, बनाय अंत्या- नुप्रास। ९ किन्न। १० दिन्न। ११ अल्हण। १२ किन्ही। १३ किन्नौ। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri