हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १०७ तुम कौ सुकहत समुझाव¹ राय ॥ दै सेख छाड़ि² हठ मिलि सुराव । परसो सुआय पतसाह पाँव ॥६०४॥ इम सुनत राव प्रजरचौ सु अंग । ब्रत टरै केमि छत्री अभंग ॥ तुव कहा कहूँ दूतै सुजानि । नन टरै वैन छत्री सुबानि ॥६०५॥ नहिं देहु सेख घन³ करै केमि । पसु पंछी जे तजि सरण जेमि ॥ रणधीर कुँवर दोउ अति उदार । बालणसी तीजो खाँन सार ॥६०६॥ ते परे खेत रावत अभंग । अब कौन मिलि⁴ राख्यो प्रसंग ॥ तब दूत द्रव्य लै जाहु ओर । कहँ⁵ रही बात६ फरमाँन तोर ॥६०७॥ मति आव फेरि भेजे सुसाहि । अब बिना जुद्ध नहिं उचित ताहिं ॥ लै चल्यौ दूत ये खबरि ऐन । जा कहे साहि सों सकल बैन ॥६०८॥ सुनि बचन बाँचि फरमाँन सोइ । कहि साहि राव समुझै न कोइ ॥ उज्जीर देखि तजबीज कीन⁷ । रण को पहार अपनाय लीन⁸ ॥६०९॥ चढ़ाय तोप तिहिं पर प्रचंड । १ समुभाव । २ छंदि । ३ प्रण(न) । ४ मिलि, मील, मेल । ५ कहा । ६ बत्त । ७ किन्न । ८ लिन्न । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri