हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १०९ पुल बाँधि¹ तोरि गढ़ करो आँन ॥ तब महरम खाँ तजबीज कीन । इक राह बाँधि गढ़ को जु लीन ॥६१६॥ पुल² बाँधि कीन गढ़ की जु राह । सुनि राव चित्त चिंता सु आह ॥ नहिं रहौ मरम³ गढ़ को सकोई । बहु फिकर राव कीनौ⁴ सु जोइ ॥६१७॥ तिहिं रैन पदम सागर सुआय(इ) । दीनौ सुसुप्न हम्मीर धाय(इ) ॥ नहिं करो कोन चिंता हमीर । सब नदी समुद्दन कौ सुसीर ॥६१८॥ तुम रहो अभै गढ़ अभै⁵ आय । इक छिन्न माहिं पुल द्यौं बहाय ॥ तब प्रात राव जग्गे हमीर । फूटि गयौ सकल बंध्यो सुनीर ॥६१९॥ सुनि साह बात⁶ अचरिज्ज मानि । टूटै न गढ़ जिय बिषम जानि ॥ पुच्छिउ⁷ उजीर तबै सुबोलि । कीजे इलाज किम कहौं खोलि ॥६२०॥ रण⁸ कै पहार कहा कीन आय । डेरा सुकीन्ह उज्जीर थाय⁹ ॥ मजबूत मोरचा तहाँ कीन्ह । बहु परी रारि दुहुँ ओर चीन्ह¹⁰ ॥६२१॥ १ बंधि । २ पुल बंधि किहूँ गढ़ को सराह । ३ मगज । ४ किबो । ५ अबै । ६ बत्त । ७ पुच्छी सुतबौ उजीर बोलि । ८ रण को पहार परि साहि आय ( आप ) । ९ थाप । १० किन्ह, चिन्ह अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri