हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ हम्मीररासो मैं करौँ बड़ो १ जिस कौ सुप्रेम ॥६३३॥ जो हनै बाल कहि तीर पाहि। रसभंग करै मैं गिनौं ताहिं २ ॥ सुनि बचन मीर गभरू सुसेख । कर जोरि कीन्ह ३ बानी बिसेष ॥६३४॥ यह धर्म्म पुरुष को कितहु ४ नाहिं । तिय ऊपर ऊँचो करत ५ बाँहि ॥ तब कहत साहि यम सजो बाँन । नुकसाँन होय अरु बचै ज्याँन ॥६३५॥ सुनि बचन श्रवन कम्माँन लीन । सो ऐंचि स्रवण तिय चरण दीन ॥ तब परी बाल ह्वै बिकल भूमि । रसभंग भयौ सब लखत पूमि ६ ॥६३६॥ लगि तीर सभा मैं परी ७ जाव । तब बढ़यौ सोच हम्मीर राव ८ । अब लौं न तीर दुग्गहिं पहुँचि । यह कौन औलिया आय सञ्चि ९ ॥६३७॥ दोहरा छंद देखि तीर अचिरज हुए, १० गढ़ मैं आवत सीर । चक्रत चहुँ दिस चाहि कै, रह्यौ ११ राव हम्मीर ॥६३८॥ मुरझि तिरिय १२ धरणी परी, भए राव चित भंग । राव कहै १३ ऐसे बली, किते साह कै संग ॥६३९॥ १ बड़ा जिसकौ रतेम । २ पाय, साय अंत्यानुप्रास । ३ कही । ४ कहत । ५ करस बाँहि । ६ भुम्मि, घुम्मि अंत्यानुप्रास । ७ परयौ । ८ जाय, राय अंत्यानुप्रास । ६ उँचि । १० भयौ । ११ रहे । १२ त्रिया । १३ कहह । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri