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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

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हम्मीररासो १११

सिंधुव बिहाग षट राग पेखि। काफी अनूप सुर मधुर लेखि॥ सब कला जीति संगीत रीति। नृतंत बाल गावंत गीति॥६२८॥ सुर सप्त गाँम तीनूँ सु भेव। इक्कीस मूर्छिना करत¹ एव॥ बहु लागडाक² गावत प्रबंध। तिहिं सुनै होत आनंद फंद॥६२९॥ हम्मीर राव राजत मसंद। दुहुँ ओर चौर ढारैँ³ अमंद॥ यहि⁴ देखि साहि गरि गयौ गब्ब। हम्मीर इंद्र पदवी सु सब्ब⁵॥६३०॥ अभिमाँन तजत नहिं⁶ मिल्यौ मोहिं। नहिं सेख देय⁷ संका न कोहि॥ यह चंद्रकला पातुर सुभेव। बहु हाव भाव हस्तक सुदेव⁸॥६३१॥ बर्षत कटाक्ष ऊपरि सुराव। मोहिं⁹ गिनत नाहि कल्लु ¹⁰रहत चाव॥ तब ताँन गाँन¹¹ गावंत मानि¹²। एडिय सुबाल मोहिं फिरत¹³ बानि॥६३२॥ अपमाँन बाल कीन्हौ अनंत। एड़ी दिखाय मुझ¹⁴ कौ हसंत॥ करि कोपि कहै पतिसाह एम।


१ घरत। २ डाठ। ३ ठोरैं। ४ तिहिँ। ५ गर्व, सर्व अंत्यानुप्रास। ६ मिल्यौ न मोहिं। ७ देत। ८ सुमेद। ६ मुहिं। १० जनु। ११ ताँन माँन। १२ जानि। १३ करत। १४ मुहिं सौं। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri