हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
हम्मीररासो १११
सिंधुव बिहाग षट राग पेखि। काफी अनूप सुर मधुर लेखि॥ सब कला जीति संगीत रीति। नृतंत बाल गावंत गीति॥६२८॥ सुर सप्त गाँम तीनूँ सु भेव। इक्कीस मूर्छिना करत¹ एव॥ बहु लागडाक² गावत प्रबंध। तिहिं सुनै होत आनंद फंद॥६२९॥ हम्मीर राव राजत मसंद। दुहुँ ओर चौर ढारैँ³ अमंद॥ यहि⁴ देखि साहि गरि गयौ गब्ब। हम्मीर इंद्र पदवी सु सब्ब⁵॥६३०॥ अभिमाँन तजत नहिं⁶ मिल्यौ मोहिं। नहिं सेख देय⁷ संका न कोहि॥ यह चंद्रकला पातुर सुभेव। बहु हाव भाव हस्तक सुदेव⁸॥६३१॥ बर्षत कटाक्ष ऊपरि सुराव। मोहिं⁹ गिनत नाहि कल्लु ¹⁰रहत चाव॥ तब ताँन गाँन¹¹ गावंत मानि¹²। एडिय सुबाल मोहिं फिरत¹³ बानि॥६३२॥ अपमाँन बाल कीन्हौ अनंत। एड़ी दिखाय मुझ¹⁴ कौ हसंत॥ करि कोपि कहै पतिसाह एम।
१ घरत। २ डाठ। ३ ठोरैं। ४ तिहिँ। ५ गर्व, सर्व अंत्यानुप्रास। ६ मिल्यौ न मोहिं। ७ देत। ८ सुमेद। ६ मुहिं। १० जनु। ११ ताँन माँन। १२ जानि। १३ करत। १४ मुहिं सौं। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११२ हम्मीररासो मैं करौँ बड़ो १ जिस कौ सुप्रेम ॥६३३॥ जो हनै बाल कहि तीर पाहि। रसभंग करै मैं गिनौं ताहिं २ ॥ सुनि बचन मीर गभरू सुसेख । कर जोरि कीन्ह ३ बानी बिसेष ॥६३४॥ यह धर्म्म पुरुष को कितहु ४ नाहिं । तिय ऊपर ऊँचो करत ५ बाँहि ॥ तब कहत साहि यम सजो बाँन । नुकसाँन होय अरु बचै ज्याँन ॥६३५॥ सुनि बचन श्रवन कम्माँन लीन । सो ऐंचि स्रवण तिय चरण दीन ॥ तब परी बाल ह्वै बिकल भूमि । रसभंग भयौ सब लखत पूमि ६ ॥६३६॥ लगि तीर सभा मैं परी ७ जाव । तब बढ़यौ सोच हम्मीर राव ८ । अब लौं न तीर दुग्गहिं पहुँचि । यह कौन औलिया आय सञ्चि ९ ॥६३७॥ दोहरा छंद देखि तीर अचिरज हुए, १० गढ़ मैं आवत सीर । चक्रत चहुँ दिस चाहि कै, रह्यौ ११ राव हम्मीर ॥६३८॥ मुरझि तिरिय १२ धरणी परी, भए राव चित भंग । राव कहै १३ ऐसे बली, किते साह कै संग ॥६३९॥ १ बड़ा जिसकौ रतेम । २ पाय, साय अंत्यानुप्रास । ३ कही । ४ कहत । ५ करस बाँहि । ६ भुम्मि, घुम्मि अंत्यानुप्रास । ७ परयौ । ८ जाय, राय अंत्यानुप्रास । ६ उँचि । १० भयौ । ११ रहे । १२ त्रिया । १३ कहह । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ११३ महिमा साहि हमीर सैं, कही बात कर जोर । सकल साह कै हसम मैं, है लघु भैया मोर ॥६४०॥ नहिं दूजो कोड साह कै, सबरे १ दल मैं और । मीर गभरू अनुज मम, जामैं इतनो जोर ॥६४१॥ छप्पय छंद नाहिं जती बिन जोग सूर बिन तेग २ न होई । इते साह कै संग मीर सरभर नहिं कोई ॥ करो हुकम मोहि राव साह कौ हनौँ ततच्छिन । मिटै सकल उतपात भाज सत्रु सेन जाय बिन ३॥ हँसि कही राव हम्मीर तब यह खुदाय दूजो दुनी। सिर बचै साह छत्र जु उड़ै यह कौतुक कीजे गुनी ॥६४२॥ करि ४ साहिब कौ याद सीस हम्मीरहिं नायौ । कियौ हुक्म तब ५ राव कोपि कै बाँन ६ चलायौ । अनल ७ पंख मनु परिय टूटि ८ आकास धरन्निय ९ । भयौ सोर बर सद्द पर्यौ महि छत्र बरन्निय १०॥ मुरझाय साह भू मैं परे ११ उड्यौ छत्र आकास दिस । तब कही उजीर पतसाह सौं तजी ज्याँन परिहरि सु रिस ॥६४३॥ पिछले निमक १२ की दोस्ती, करी जाँन बकसीस । जो दूजो सर छंदिहै, हनिहै १३ बिस्वा बीस ॥६४४॥ जा गढ मैं महिमा रहै, किम आवै वह हथ्थ । अहि ज्यूँ गही छहूँदरी, यौं हजरत की गथ्थ ॥६४५॥ छप्पय छंद कह महरम खाँ बात इसी १४ हजरति सुनि आवै । १ सिगरे । २ तेज । ३ धन । ४ करि जगदीसहिं याद; इष्टदेव निज सुमिरि । ५ हम्मीर । ६ परसु । ७ अनिल । ८ द्विट्टि । ६ वरन्निय । १० धरन्निय । ११ भुम्मी गिर्य्यड । १२ निमष । १२ हनै जु । १४ इती । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११४ हम्मीररासो वह$^१$ महिमा बर बीर राव का हुकम जु पावै ॥ गहै तुम्हें ततकाल पाँव लंगर गहि मेलै : उसै दिल्ली बैठाय जोर मरजात सु-पेलै । हठ छाड़ि साहि रणथंभ का करो कूच चालिये दिली । जै रही राव हम्मीर की पतिसाही मारी गिली ।६४६॥ तब$^२$ सु साह हठ छाड़ि उलटि दिल्ली दिस आए । पिता बैर करि याद साह सुरजन पछिताए ॥ रतन पंच लै संग$^३$ साह कै पाँव सु लग्यौ । तात बैर हिय जानि कोप उर मैं अति जग्यौ ॥ कर जोरि साह सुरजन कहै सुगम दुग्ग मो हथ्थ गनि । यह जितो राज$^४$ रणधीर को मोहिं दैन की बाच भनि ।६४७॥ दोहरा छंद हँसि हजरत ऐसे कही$^५$, सुरजन आगे$^६$ आव । दियौ राज रणधीर कौं, करूँ बड़ा उमराव ॥६४८॥ करि सलाँम सुरजन तबै, बीरा खायौ कोपि । आप$^७$ भवन हिकमति रची, स्वामि धर्म्म सब लोपि ॥६४९॥ जौरा भौंरा खास में$^८$, भरे जु कोरे चाँम । फजणि आनि हाजरि भयौ, सुरजव करी$^९$ सलाँम ॥६५०॥ हाथ$^{१०}$ जोरि हम्मीर सों, सुरजन कही सुजाँन । मिलो राव पतिसाह सों, गढ़ बीत्यौ$^{११}$ सामाँन ॥६५१॥ बिनती$^{१२}$ सुनत$^{१३}$ हमीर तब, कियौ कोपि रत नैन । छंडि टेक छत्री तनी, रे कपूत गनि$^{१४}$ ऐन ॥६५२॥ १ यह । २ तब अलाउदी छंडि हठ दिल्ली दिसि आए । ३ भेंट । ४ राव हम्मीर को । ५ कहै । ६ अगु, अग्गै । ७ आय । ८ द्वै । ९ किय । १० हथ्थ । ११ बित्यौ । १२ विनति । १३ सुनि । १४ गति । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ११५ चौपाई छंद कहैँ राव हँसि सुरजन सुनिजै । मिलो छाड़ि¹ पन² यह न गुनिजै ॥ सुनि कापुरुप कपूत अयानै । छाड़ि³ टेक को⁴ छत्री जानै ॥६५३॥ फिर हमीर सुज्जन सों पूछी⁵ । तेरी बात लगत मुहिं झूछी⁶ ॥ जौँरा भौँरा खास सु दोई । कैसे निबरै जानत सोई ॥६५४॥ कहै साह यह तो हैँ⁷ छानी । प्रगट देखि निज नैनन जानी ॥ पाथर⁸ डारि खास मैं जोई९ । सुनिए श्रवण सद्द१० सब कोई ॥६५५॥ दोहरा छंद पाथर¹¹डारयौ खास महँ, खुड़क्यौ चाँम¹२अपार¹३ । जिस सब्द¹४ नीचै रही, राव यहै¹५ निरधार ॥ ६५६ ॥ खुड़क्यो¹६ सुनि दुव¹७ खास को, चढ़यौ सोच उर राव । तब महिमा हम्मीर सों, कहै बचन गहि पाँव ॥ ६५७ ॥ छप्पय छंद कहै¹⁸ जु महिमा सेख राव मुहिं हुकुम सु दीजै१९ । मिलो साह कौ जाय फिकर इतनो नहिं कीजै२० ॥ १ छंडि । १२ प्रन । ३ छंडि । ४ नहिं । ५ पुच्छी । ६ छुच्छी । ७ नहिं । ८ पत्थर । ६ सोई । १० सब्द । ११ पत्थर । १२ चर्म्म । १३ अधार । १४ सबै । १५ येह । १६ खुड़को । १७ दोउ । १८ कह महिमा तब सेख । १६ दिज्जै, दिजिय । २० किज्जै, किजिय । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११६ • हम्मीररासो अब¹ दिल्ली कौ कूँच² साहि कौ तुरत कराऊँ। तुम राजो रणथंभ जुद्ध मैं सकल सिराऊँ ॥ हम्मीर राव हँसि यौं³ कहै⁴ सदा कोन॒ जग थिरि रहै। छिन⁵ भंग अंग लालच कहा सुजस एक⁶ जुगजुग रहै ॥६५८॥ दोहरा छंद अल्लादीन पतिसाह सौं, गही⁷ खग्ग⁸ करि टेक । दुख मैं बिरले मित्त⁹ हैं, सुख मैं मित्त अनेक ॥ ६५९ ॥ हठ तौ राव हमीर को, औ¹⁰ रावण की टेक। सत राजा हरिचंद को, अर्जुन बाण अनेक ॥ ६६० ॥ गही टेक छाड़ै नहीं, जाभ चौंच करि जाय । मीठो¹¹ कहा अँगार कौ, ताहिं चकोर चुगाय¹² ॥ ६६१॥ छप्पय छंद सब¹³ बातैं यह कही सेख अपनै घर आयौ। भई¹⁴ राति सुरजन्न निकट हजरति कै आयौ¹⁵ ॥ हाथ¹⁶ जोरि सिर नाय कह्यौ छल राव भुलायौ । द्वादस कै सामानँ रक्खि गढ़ तोरि हलायौ ॥ ये¹⁷ कहिय बात¹⁸ सुर्जन सकल रणत भँवरटूट्यौ¹⁹ अबै। हजरति प्रताप महा बंक गढ़ सहल भयौ²⁰ सद्कै सबै ॥६६२॥ दोहरा छंद चंदकला देवलि कँवरि²¹, पारसि महिमा साह। माँगत साह अलावदी, अबै लै मिल्यौ आय²² ॥६६३॥ १ अबै दिली। २ कुच्च। ३ इमि। ४ कह्यौ। ५ क्षण। ६ इक। ७ गहिय। ८ तेग। ६ मीत जुग। १० अरु। ११ मिठ्ठौ। १२ जु खाय। १३ राव बात (बत्त) ये (इमि) कहिय सेख अप्पन घर आयव (आयउ)। १४ भइय रत्ति। १५ धायौ। १६ हथ्थ। १७ यह। १८ बत्त। १६ टुट्यौ। २० लयौ। २१ कुँमरि। २२ साय, आय अंत्यानुप्रास। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ११७ छप्पय छंद सुनि हजरति कै बचन राव हम्मीर रिसाए। कहा अलावदी साहि गब्र्ब कै बचन सुनाए॥ मैं हमीर चहुवाँन साह सौं हम कछु चाहैं। चिमना बेगम एक¹ और चिंतामणि साहैं॥ पाइक च्यारि पीराँ² सहित कहै³ साह ये दिज्जिये। छुटै न हठ हम्मीर को कुच्च दिली कौ किज्जिये॥६६४॥ ये हमीर कै बचन⁴ बाँचि⁵ पतिसाह रिसानौ। रे हराँम कमबख्त किसो गढ़ फते करानौ⁶॥ सुरजन झूठौ कहै राव हम्मीर न मानै⁷। नहिं महिमां कौ देइ⁸ मिलै नहिं हठी अमानै॥ यह कही साहि सुरजन्न⁹ तत्र देखिय¹⁰ अब कैसी बनै। रणथंभ राव हम्मीर जुत मिटैं होहिं¹¹ कौतुक घनै॥६६५॥ जब करि बदन मलीन राव रणवासहिं आए। उठि राणी कर जोरि राव कौं सीस नवाए॥ गढ़ बीतयौ¹² सामाँन भयौ भंडार सु रीतौ। ✳ टेक छोड़ि¹³ करि सेख देहु अब माँगु न बीतयौ¹⁴॥ बिलखाय बदन राणी कहै द्वादस बर्ष जु तुम लरे। बिप्रीति बुद्धि कौने दई हीन बचन¹५ मुख निक्करे॥६६६॥ १ इक्क। २ पीरन। ३ कहत राव। ४ ज्वाब। ५ चंचि। ६ करि जानौं। ७ मन्ने। ८ देय। ९ सुरजन तवै। १० देखो। ११ हूहि। १२ बित्यौ। १३ छंडि। १४ बीतौ; रित्तौ, बित्तौ अंत्यानु- प्रास। १५ बत्त। ✳ कहो देउँ सेख महि मागु न बीत्यौ। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११८ . हम्मीररासो चौपाई छंद राणी कहै सुनो महरावं । ऐसे बचन उचित नहिं भावं ॥ या तन बचन सार स्रुति भाखै १ । तन मन धन दै बचन जु राखै २ ॥६६७॥ तन धन भ्रात पुत्र अरु नारी । हरि बिधु त्यागि बचन प्रतिपारी ॥ राज पाट अनित्य ३ सु जानो । रहै नित्य इक सुजस बखानो ॥६६८॥ केकइ ध्वज अधविग्रह दीनौ । बिद्या भवन जोति जस लीनौ ॥ भव जो कही सत्य वह जानो । और न होय कोटि बुधि ठानो ॥६६६॥ दोहरा छंद 'कब हठ करै अलावदी, रणतभँवर गढ़ आहि । कबै सेख सरणे रहै, बहुरौ ४ महिमा साहि ॥६७०॥ सूर सोच मन मैं करो ५, पदवी ६ लहौ न फोरि । जो हठ छंडो राव तुम, उतन लजै अजमेरि ॥६७१॥ सरण राखि सेख न तजो, तजो सीस गढ़ देस । राणी गव हमीर को ७, यह दीन्हौ उपदेस ॥६७२॥ छप्पय छंद कहाँ पँवार जगदेव सीस आपन कर कट्यौ । कहाँ भोज बिक्रम सु राव जिन पर दुख मिट्यौ । १ भक्खै । २ रक्खै । ३ अनिच्च (त्य) । ४ बहुरचौ । ५ करै । ६ पदई । ७ की । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १११ सवाभार नित करन¹ कनक बिप्रन कौं² दीनौँ³ । रह्यौ न रहिए⁴ कोय देव नर नाग सुचीनौँ ॥ यह बात⁵ राव हम्मीर सूँ राणी इम आसा कही । जो भए चक्कवै मंडली सुनो⁶ रांव दीखै नहीं⁷ ॥ ६७३ ॥ दोहरा छंद धन जोबन नर की दसा, सदा न एक बिहाय । पाख⁸ पाँच ससि की कला, घटत घटत⁹ बढ़ि जाय* ॥ ६७४ ॥ राखि सरण सेख न तजो, तजो सीस गढ़ बेगि । हठ न तजो पतसाह साँ, गहि कर तजो न तेगि ॥ ६७५ ॥ जितो ईस तुम्ह बर दियौ, अब फिर चाहत काय । करो जंग पतसाह सौँ, सनमुख सार समाय ॥ ६७६ ॥ जीवन¹⁰ मरन संजोग जग¹¹, कौन मिटावै ताहिं । जो जन्मै संसार मैं अमर¹² रहै नहिं आहि ॥ ६७७ ॥ कोउ सदा नहिं थिर रहै, नर तरु गिरवर गाँव । करयौ राज रणथंभ को¹³, अपना¹⁴ तन परमाँन ॥ ६७८ ॥ कहाँ जैत कहँ सूर कहँ, कहँ सोमेश्वर राण । कहाँ गए प्रथिराज जे, जीति साह दल आण ॥ ६७९ ॥ कहाँ जैत कहँ सूर प्राँथ, जिन गहे गौरी साह । होतब मिटै न जगत मैं, किज्जिय¹⁵ चिंता काइ ॥ ६८० ॥ होतब मिटै न जगत मैं, कीजे चिंता कोहि । १ प्रत्थि । २ कहैं । ३ दिन्नव । ४ रहिहैं । ५ बत्त । ६ कहो । ७ कहीं । ८ पख, पक्ख, पाखि । ९ बढ़त । १० जाँमण । ११ जे । १२ अमर न कोई आहि । अमर न कोउ रहाहि । १३ गढ़ । १४ हम अपनै (अप्पन) तप नाँम । १५ कीजे । * पाखि पाखि ससि कला ज्यों घटत बहुरि बढ़ि जाय । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१२० हम्मीररासो आसा कहै हमीर सोँ, अब चूको मति सोहि ॥ ६८१ ॥ बिछुरन मिलन सँजोग जग, सब मैं यह बिधि सोह । आसा कहै हमीर सह, हम तुम भया बिछोह ॥ ६८२ ॥ धन्य बंस जिहिं जन्म तब, राव सराहत तांहिं । और कौन तुम बिन त्रिया, बचन कहै समुझाय ॥ ६८३ ॥ धन्नि पतिव्रता नारि तू, राव सराहत आप । अवर कौन तुम बिन त्रिया, कहै बचन बिन पाप ॥ ६८४ ॥ राखि सेख सरणौ तजौं, कुल लाजै चहुवाण । तुम साकौ गढ़१ कीजियौ२, निरखि साह नीसाण ॥ ६८५ ॥ लीन३ परिक्षा बहुत मैं, तू छत्री कुलवाल । तुव४ मत मैं देख्यौ५ सुदृढ़, यही बात६ यहि काल ॥ ६८६ ॥ सुने राव कै बचन तब, परी धरनि७ मुरझाय । निठुर बचन मुख तैं जु कहि, तजि रणबास रिसाय ॥ ६८७ ॥ हम पतिबरता पुरुष बिन, कौन दिसा चित कौ धरैं । आसा कहै हमीर सोँ, तुम पहला साकौ करैं ॥ ६८८ ॥ छप्पय छंद खोलि सकल भंडार तुरत८ जाचिक सु बुलाए९ । बिप्र भली विध पूजि१० दिये वंदी मन भाए ॥ भवन तिरिया११ गढ़ मॉम तजे हम्मीर मोह बिन । मन क्रम बचन सु त्यागि भए निज धर्म्म लीन खिन ॥ ततकाल राव रणबास तजि सभा आय दरबार किय । छाये जु मित्र१२ मंत्री सु बुध सूर बीर आदर सुदिय ॥ ६८६ ॥ कहै राव हम्मीर सुणो चतुरंग महा बर । १ गढ़ मैं करौ । २ किज्जियौ । ३ लिन्न । ४ तुममन । ५ दिख्यौ । ६ बत्त । ७ भुम्मि मुज्झाय । ८ सर्व्व, सव्व । ६ बुल्लाए । १० पुज्य । ११ त्रिया । १२ मंत्र । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १२१ तुम्हें रतन की लाज जुद्ध१ हम करें नियम करि ॥ तुम सब बात समर्थ२ करो जैसी तुम भावै । रणतभँवर३को लोग तहाँ कछु दुःख न दुख नहिं, पावैं ॥ गढ़ सजो जाय चित्तोड़४ को प्रजापालि सुख दिज्जिये । सब साँम दाँम दंडह सहित भेद नित्य५सब किज्जिये ॥ ६९० ॥ कहत तबै६ चतुरंग उचित७ यह हम कौं नाहीं । आप८ रहो हम९ रहें लरैं हम जस कै ताहीं ॥ कहे राव यह प्रजा सकल चित्तोड़१० समावै । यह परिकर सब जितो राखि११आपन१२ जु सुहावै ॥ चतुरंग राव ले रतन कौं गढ़ चित्तोड़१३ सुचल्लिये । प्रथम जाय अल्हण सुपुर करुणाजुत डेरा किये ॥ ६९१ ॥ दोहरा छंद पंच सहस चतुरंग लै, चले१४ रतन कै साथ । तब हमीर दरबार किय, कही सबन यह गाथ१५ ॥ ६९२ ॥ जीवै सो घर भुगिवै१६, जुझझे१७ सुरपुर वास । दोऊ जस कित्तो१८ अमर, तजो मोह जग आस ॥ ६९३ ॥ जीवन चाहत जो कोऊ, ते सुखैन घर जाहु । कहै राव सबकें सुनत, हम सँग मरन उछाह ॥ ६९४ ॥ छप्पय छंद सुनत बचन ये सेख भवन अपने कौ आए१९ । कुटम२० सेख करि खेस करद लै अद्दल पठाए ॥
१ युद्ध । २ समर्थ । ३ यह परिकर सब जितौ, राखि आपन जु . सुहावै । ४ चीतोड़ । ५ नीति । ६ तब्ब । ७ उदित । ८ अप्प । ६ सब । १० चीतोड़ । ११ रक्खि । १२ अप्पन । १३ चीतोड़ । १४ चलिय, चल्ल्यउ । १५ सत्य, गत्थ, अंत्यानुप्रास । १६ भोगिवै । १७ जूझे । १८ कीरति । १६ कै धायौ । २० कुटम खेसि सब सेख । १६ CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१२० हम्मीररासो कहै राव सों बचन नैन जल सों भरि आए । सुख संपति रणथंभ त्यागि करिये मन भाए ॥ सुर नर कायर १ सूरमा कहै सेख थिर नहिं कोइ । हम्मीर राव चहुवाँन २ अब करै साहि सों जंग सोइ ॥ ६९५ ॥ दोहरा छंद जीवन कौ सब कोउ कहैं, मरन कहै नहिं कोय । सती सूरमा पुरुष को ३, सरतहिं संगल होय ॥ ६९६ ॥ छप्पय छंद केसर सौंधै बसन सकल उमरावन सज्जै । अलादीन पतिस्याह फेरि कहि कब कब गज्जै ॥ सहस गऊ करि दाँन राव सिर मौर सु बंध्यौ । करथब ४ जुद्ध को साज छत्र कुल सुजस सु संध्यौ ॥ निस्साँन ५ पाँन बज्जे सु घन हर्ष ६ बीर बानै पड़े । चहुवाँन राव हम्मीर तब जुद्ध काज चौरै चढ़े ७ ॥ ६९७ ॥ दोहरा छंद पंच सहस रतनेस सँग, गढ़ चीतोड़ ८ पठाय । पंच सहस रणथंभ गढ़, दृढ़ रावत रहू आय ॥ ६९८ ॥ असी सहस सेना सकल, चढ़ी राव कै संग । माया मोह बिरक्त मन, जुरन साह सों जंग ॥ ६९९ ॥ छप्पय छंद कमध्वज कूरम गोड़ तँवर परिहार ९ अमानो । पौरच बैस पुँडीर बीर चहुवाँन सु जानो ॥ जइव ६ गोहिल धीर चढ़े गहिलोत गरूरं । १ कातर । २ पतिसाह सों करो जंग अद्भुत सोइ । ३ कै । ६ करिव । ४ नीसाँन । ५ हरषि । ६ कढ़े । ७ चित्तोड़ । ८ पड़िहार । ६ जादम । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १२३ सैंगर और पँवार भिझ १ इक भोज मरूरं ॥ छत्तीस वंस छत्री चढ़े जिम पावस बहल बढ़े । हम्मीर २ राव चहुवाँन तब जंग कज्ज ३ चौरै कढ़े ॥ ७०० ॥ जेठ मास बुधबार सप्तमिय पक्ख ४ अँध्यारी । करि सूरज कौ नमन राव कर खग्ग ५ सम्हारी ॥ हरषे सुर तेंतीस और हरषे जु कपाली । नारद सारद हरषि वीर बावन जुत काली ॥ हरषी जु हरषि ६ अच्छर ७ हरषि ८ जुग्गिन बृंद सु नच्चियव । जंबुक कराल गिद्धनि हरषि सूर हरषि हिय रच्चियव ॥७०१॥ हनूफाल छंद सजि सूर राव हमीर । बिरदाय ९ बीर सु धीर ॥ जनु छत्र कुल को लाज । रन सिंधु की मनु पाज ॥ ७०२ ॥ दातार सूर सु अंग । निस द्यौस जुट्टत जंग ॥ धरि स्वामि धर्म्म सुरंग । वढ़ि १० रहै तिल तिल अंग ॥ ७०३ ॥ गढ़ कोट औटत एक । तोरंत करि करि टेक ॥ सिर खौरि चंदन सोह । रवि वंदि चंदि सुलोह ॥ ७०४ ॥ गति उद्ध ११ कुद्दत भट्ठ । ज्योँ १२ खेलन उतरे नट्ठ ॥ अँग बर्म्म चर्म्म सु कीन । सिर टोप औप सु दीन १३ ॥ ७०५ ॥ दस्ताँन रचि सु हत्थ । करि चहै गत्थ १४ अकत्थ १५ ॥ बहु न्हान दाँन सु कीन । गो स्वर्ण विप्रन दीन १६ ॥ ७०६ ॥ रबि संभु विष्णु सुपुज्जि १७ । मन साह सैं करि दुज्जि १८ ॥ १ भोल । २ दल हरषि राव हम्मीर कै साह जीव अचरिज बढ़े । ३ काज । ४ पाख । ५ तेग । ६ हूर । ७ अच्छरि । ८ सकल । ९ रन । बिरदार । १० रहिव । ११ उर्घ । १२ जिम खेल खिल्लिउ । १३ किन्न, दिन्न अंत्यानुप्रास । १४ गत्थ । १५ अगत्थ । १६ किन्न, दिन्न अंत्यानुप्रास । १७ पूजि । १८ दूजि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१२४ हम्मीररासो आचारं भार फबंत । दोउ पच्छ सुद्ध सुभंत ॥ ७०७ ॥ बहु बंदि बिरदत जाय । बढ़ि द्वंद हर्ष सु आय१ ॥ असमॉँन लगि२ सु सीस । झलहलैं तेज सु दीस ॥ ७०८ ॥ सँग चढ्यव३ बंस छत्तीस । संग्राँम अचल सु दीस ॥ ७०९ ॥ दोहरा छंद स्वामि धर्म्म धारैं४ सदा, माया मोह बिरक्त ॥ दाँन कृपानँ उदारमति, अचल अद्रि हरभक्त ॥ ७१० ॥ साजत साज सुबाजि सजि, कीन५ बनाव सु ऐन ॥ चंचल चपल बिचित्र गति, राग बाग लखि सैन ॥ ७११ ॥ छंद हनूफाल तब६ साहनी नृप बोलि । हय सहस सोलह खोलि ॥ सब वंस उच्च सु बाज७ । लखि८ रूप मोहत राज९ ॥ ७१२ ॥ मनु 'उच्चस्त्रव कै बंधु । आबर्त्त चक्र सु कंधु ॥ तुरकी हजार स पाँच । मग चलत करत सु नाच१० ॥ ७१३ ॥ ताजी हजार सु रुद्र । गुन सील रूप समुद्र ॥ सब वीर ताजि११ कुलीन । नृप बंटि१२ बाजि सु दीन ॥७१४॥ बनि जीन जटिल जराव । नग हीर पन्न सुहाव ॥ सिर बनिय कलँगिय ऐन । मनु सजे बाजि सु मैन ॥ ७१५ ॥ गजगाह बाह अथाह । जो करैं१३ जल पर राह ॥ नग मुक्त माल सुयाल । गुम्फी१४ सु रुचि१५ बहु काल ॥ ७१६ ॥ मखमलीय सिगरे साज । मनु१६ सबै रबि को१७ बाजि ॥ जिन परिय पखरि अंग । लख भ्रमत दिट्ठि१८ अभंग ॥ ७१७ ॥ १ जाहिं आहिं, अंत्यानुप्रास । २ लग्यिय । ३ चढ़े । ४ धारहिं । ५ किन्न । ६ तब साह लिय नृप बुल्लि । ७ बाजि । ८ लख । ९ राजि । १० पच्च, नव्च अंत्यानुप्रास । ११ धीर । १२ बाँटि । १३ करहिं । १४ गूँथी । १५ सरचि । १६ सब्ब । १७ कै । १८ दीठि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १२५ बहु सिरी सीसन सोहि । उड़ि चलैं भरि जो कोहि १ ॥ गति चलैं २ चंचल एमि । जिनि पवन पहुँचे केमि ॥ ७१८ ॥ धर धरत सुम यों मानि । मनु जरत अगि ३ सुजानि ॥ जल चलैं थल जिमि बट्ट ४ । लखि उड़ें ओघट घट्ट ५ ॥ ७१९ ॥ मृग गहत डार कमाँन । नहिं पच्छि पावहिं ६ जाँन ॥ गति पवन देखि लजात । जनु मुकुर क्रांति सगात ७ ॥ ७२० ॥ दोउ बंस सुद्ध प्रकास । बढ़ि डील पील सु जास ॥ यहिं बिधि सु लिन्ने ८ मौलि । नग हेम सर भर तौलि ॥ ७२१ ॥ कोड बने कच्छिय ऐन । सब ९ उड़ै पच्छिय गैन १० ॥ ऐराक बंस सुसील । गुन भरे झलकत डील ॥ ७२२ ॥ कंधार उपजि स सुद्ध । जनु लखत रूप सु उद्ध ॥ काबलिय डील अनूप । तिहिँ देखि ११ मोहत भूप ॥ ७२३ ॥ अरु चीन कै जु नवीन । ताजी सगुन गन लीन ॥ बर १२ बीर अनक जु डील । जो लिये साटैँ १३ पील ॥ ७२४ ॥ रँग रंग अंग बनाव । सो लिये पंक्ति १४ दाव ॥ सिरगा सुरंग समंद । संजाफ सुरख अमंद ॥ ७२५ ॥ कुम्मैत कुमद कल्याँन । मोती सु मगसी आँन ॥ सबजारु १५ सब रँग भौर । चंपा सु चीनिय चौर ॥ ७२६ ॥ अबलख सु गरड़ा रंग । लक्खी जु अतिहि १६ इमंग ॥ हंसा हरई बाजि । तीतुरिय ताँबी साजि ॥ ७२७ ॥ भिन भिन्न टुकड़ी साजि । चढ़ि चलिय रावत गाजि ॥ चहुवाँन राव हमीर । रँग रंग रचन सुधीर १७ ॥७२८॥ १ सोह, कोह अंत्यानुप्रास । २ चलहिं । ३ अग्नि । ४ बाट । ५ घाट । ६ पावैं । ७ सतात । ८ लीने । ६ सँग । १० औन, गौन, अंत्यानुप्रास । ११ दिक्ख, पिक्ख । १२ अञ्चिय (अरबिय) अनोखे डील । १३ सहैं । १४ लगे पंकज । १५ सु । १६ ऐरि । १७ रण रंग रचनं धीर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१२६ हम्मीररासो छंद त्रोटक गजराज सबै सत पंच सजे । गिरगात¹ मनो घन भट्ट गजे ॥ सु महावत जंत्रन मंत्र रजे । करि बंधन² पीर सुधीर कजे ॥७२९॥ परि पांय सजाय निकट्ठ खरे । पग³ खोलि जंजीर सुबीर अरे⁴ ॥ बिरझाय भले मन हत्थ कियं । असनाँन कराय सँगार लियं ॥७३०॥ तन तेल सिँदूरन चित्र कियं । सिर चंद अमंद सुरंग दियं ॥ जनु कज्जल बह्वल पावसयं । तड़िता घन⁵ चंद कि मावसयं ॥७३१॥ सजि डंबर अंबर सो लगियं । घन घोर घटा सु पटा गिजियं⁶ ॥ कसियं हवदा ध्वज धार बली । मनु पंगति पन्नग की जु चली ॥७३२॥ बर्षा घन घोर सु जानि परै । कबि रूप स्वरूप समाँन करै ॥ बहु बह्वल बारन बृंद बढ़े⁷ । ध्वज बैरख लाल निसाँन कढ़े ॥७३३॥ तड़ितां घन मैं दमकंत मनो । बगपंति सुई गजदंत भनो ॥ गरजै बहु गाज सु गाज मनं । १ गिररात । २ बंदन । ३ पदपाय सुजाय ४ खुल्हि । ५ धनु । ६ गजिय । ७ चढ़े । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १२७ मिलियौ ससि सूरज गोन भनं ॥७३४॥ बर्षै हृद मह सुभद्द सदा । सु बहैं बहु भाँति सुभद्द¹ मुढ़ा ॥ सिर ढाल ढलक्कत एमि लसैं । ससि जीव धरासुत एक बसैं ॥७३५॥ अधधुंध चलै मग उम्मगयं । मनु काल कराल उठे जगयं ॥ चरखी बहु बाँन जु नेज लियं । धरि सेन सुअग्र² सुभाय क्रियं ॥७३६॥ पढ़ लंगद ओर जँजीर³ जुटे । नहिं खुल्लत आदुव न्याय लुटे⁴ ॥ बल रासि अमाँन⁵ सुक्रोहभरे । नन चालत⁶ मग्ग अमग्ग अरे ॥७३७॥ बहु दुंदुभि घोर सुनैं श्रम्रनं⁷ । बिरदाय सुनंत करैं गमनं ॥ सिर चौर दुरंत इसे दरसैं । तम दाबि⁸ दिनेस मरीचि लसैं ॥७३८॥ चतुरंगनि राव हमीर तनी । सब भाँतिन सोभ अनंत बनी ॥ सब रावत आय जुहार क्रियं । चहुवाँन सबै सिर भार दियं ॥७३९॥ धरि अग्र⁹ सु पिल्लन¹⁰ डिल्ल¹¹ पिले । बहु चंचल बाजिन लाज¹² खिले ॥ १ नद्द । २ अग्रग । ३ जंजिर जोर जटे । ४ छुटे । ५ अमावन । ६ चल्लत । ७ स्रवनं । ८ दब्बि । ९ अग्रग । १० पीलन । ११ डील । १२ साज । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१२८ हम्मीररासो बहु दुंदभि बाजत¹ घोर घनं । पट गोमुख भेरि सु चंग मनं² ॥७४०॥ सहनाइय सिंधुर राग ररं । बिरदावत बंदि कबिंद भरं ॥ उमगे चहुवाँन बिकट्ट दलं । अप अप्प सु बीर कराय हलं ॥७४१॥ चहुँ ओर कितेक सु पुंगल कै । करिहा³ सजि संग चले बलकै ॥ तिनकी सज मानव चित्र रचे । धरि दूर नजदीक करै सु रचै ॥७४२॥ असवारिय सज्ज बनी तिनतैं । खबरैं बहु लेत घने बन तैँ ॥ बहु तोप जलेबिन⁴ अग्र बनी । सब सिंदुर लेप करी जु घनी ॥७४३॥ तिन ऊपर बैरख बूंद सजी । जम की मनु जीभ अनेक गजी ॥ बलि देत चलै अरिबृंद भखै । मद चक्कर मक्खर⁵ कोप धखै ॥७४४॥ हथनारि जँबूर सु म्वद्दरयं । लुटिया तुबकै बहु अहरियं ॥ धरि अग्र सबै चहुवाँन चढ़े । बहु बंदि कबिंद सुछंद पढ़े ॥७४५॥ इहिं भाँति उभै दल कोप कियं । हरखे बर बीर सुधीर हियं ॥७४६॥ १ बजत । २ हनं । ३ करहा ( ऊँट ) । ४ जलेवय, अग्ग । ५ मक्खत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १२९ दोहरा छंद श्रवण सुनै बर बीर रस, सिंधव राग अपार । हरखि उठे दोउ तिहिं समैं, मिलन बीर सिंगार ॥७४७॥ छंद हनूफाल मिलनै सुबीर सिंगार । दुहु हरष हिये अपार ॥ बर बीर हरखेउ अंग । उत अच्छरी¹ सु उमंग ॥७४८॥ तन उभै मज्जन कीन । भये दाँन माँनस लीन ॥ तहाँ कौच वीर नवीन । रचि बाल बसन प्रबीन ॥७४९॥ इत टोप बीरन सीस । कसि कंचुकी तिय रीस ॥ बहु अस्त्र बंधि सु बीर । अच्छरि सु भूषण हीर ॥७५०॥ इत सूर खङ्ग सु लीन । उत बाल अंजन दीन ॥ इत ढाल बीरन बंधि । ताटंक श्रवणनि संधि ॥७५१॥ सामंत बंधि कटार । अच्छरी तिलक सुधार ॥ मुख पाँन ज्वॉन सुभाव । तिय चंप दंत जराव ॥७५२॥ इत कसी सूर कमाँन । दृग बाम चमक निदाँन ॥ धरि बीर कर दस्ताँन । अच्छरिय महँदी पाँन ॥७५३॥ बरच्छी सु लीनिय सूर । बर माल कीनिय हूर ॥ सिरपेच सूर जराव । तिय सीस फूल सुहाव ॥७५४॥ इत तबल तौरा नेत । तिय हाव भाव समेत ॥ रचि सूर सेलिय अंग । अच्छरिय हार उमंग ॥७५५॥ कसि तून बीर स जंग । अच्छरिय नैन अपंग ॥ कर केहरी नख सूर । उत पानि पानि सहूर ॥७५६॥ लिय बीर तुलसिय माल । बर माल लीन स बाल ॥ कसि सूर मोजा पाँय । नूपूर सु बाल सुहाय ॥७५७॥ कसि सूर बाजि सु तंग । बिम्माँन बाल उमंग ॥ इहि भाँति सूर सबाल । उतकंठ मिलन तिकाल ॥७५८॥ १ अपछरी । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१३० हम्मीररासो दोहरा छंद उमगि उमगि हम्मीर भट, चले सकल करि चाव । च्यारि अनी चतुरंग की, चढ़े संभरी राव ॥७५९॥ उतै साह कै मीर भर, खाँन ओर उमराव । रणतमँवर छिक्किय १ हरषि, नाना करिव बनाव ॥७६०॥ च्यारि दरा घाटी जिती, कीने घाटारोह । कालं रूप कोपे २ तुरक, बाँन बिकट जंसोह ॥७६१॥ भुजंगप्रयात छंद चढ़े बीर कोपे दुहूँ ओर धाए । मनो काल कै दूत अद्भुत्त आए ॥ इतै राव हम्मीर कै बीर छुट्टे । उतै मीर धीरं गहीरं सु जुट्टे ॥७६२॥ उड़ी रैन सैनं न दीखंत भाँनं । दुहूँ ओर घोरं सु बज्जे निसाँनं ॥ छुटै२ तोप बाँनं दुहूँ ओर जोरं । धरा अंबरं बीच मच्चे सु सोरं ॥७६३॥ उठी ज्वाल माला धरा पै उपट्टे । धुवाँ घोर घोरं सु जोरं प्रगट्टे ॥ मनो दोय सिंधू तजैं आय वेला । प्रलेकाल कै काल कीनो समेला ॥७६४॥ 'दुहूँ ओर घोरं सु गोलं बरक्खैं । मनो मोघ ३ बोला अतोलं ४ करक्खैं ॥ उड़ै अग्रपब्बय ढहैं गढ्ढ फोटं । परैं गज्ज बाजं धरा धूरि लोटं ॥७६५॥ प्रलै पावकं जानि उट्ठी लपटैं । १ छेकिय, छिक्यउ । २ कुप्पिय । ३ मेघ । ४ अतुल्लं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri