हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० हम्मीररासो दोहरा छंद उमगि उमगि हम्मीर भट, चले सकल करि चाव । च्यारि अनी चतुरंग की, चढ़े संभरी राव ॥७५९॥ उतै साह कै मीर भर, खाँन ओर उमराव । रणतमँवर छिक्किय १ हरषि, नाना करिव बनाव ॥७६०॥ च्यारि दरा घाटी जिती, कीने घाटारोह । कालं रूप कोपे २ तुरक, बाँन बिकट जंसोह ॥७६१॥ भुजंगप्रयात छंद चढ़े बीर कोपे दुहूँ ओर धाए । मनो काल कै दूत अद्भुत्त आए ॥ इतै राव हम्मीर कै बीर छुट्टे । उतै मीर धीरं गहीरं सु जुट्टे ॥७६२॥ उड़ी रैन सैनं न दीखंत भाँनं । दुहूँ ओर घोरं सु बज्जे निसाँनं ॥ छुटै२ तोप बाँनं दुहूँ ओर जोरं । धरा अंबरं बीच मच्चे सु सोरं ॥७६३॥ उठी ज्वाल माला धरा पै उपट्टे । धुवाँ घोर घोरं सु जोरं प्रगट्टे ॥ मनो दोय सिंधू तजैं आय वेला । प्रलेकाल कै काल कीनो समेला ॥७६४॥ 'दुहूँ ओर घोरं सु गोलं बरक्खैं । मनो मोघ ३ बोला अतोलं ४ करक्खैं ॥ उड़ै अग्रपब्बय ढहैं गढ्ढ फोटं । परैं गज्ज बाजं धरा धूरि लोटं ॥७६५॥ प्रलै पावकं जानि उट्ठी लपटैं । १ छेकिय, छिक्यउ । २ कुप्पिय । ३ मेघ । ४ अतुल्लं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri