हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १३१ जरं उज्झरं सूझरं१ यौं झपहैं ॥ लगे गोल मैं गोल गोला सु गज्जैं । भए वार पारं उपम्मा सु रज्जै ॥७६६॥ मनो स्याम कै त्रास है वारपारं२ । चहूँ ओर राजंत है चारु बारं ॥ रहे गिद्ध तामैं घने बैठि अद्रं । करैं ध्याँन बैठे गुफा मैं मुनिंद्रं ॥७६७॥ उड़ै साथि गोलाँन कै बीर ऐसैं । मनो फाटिका३ तैं उड़ै जट्ट जैसेँ ॥ चलै तोप जोरं करैं सोर भारी । दरै बिज्जुरी सी घने४ एक बारी ॥७६८॥ छुटै एक बारैं५ घनी चादरं६ यौं । मनो सार भूजै बनै यों घनै यौं ॥ बँदूकैं हजारं चलैं एम्नि राजैं । मनो मेघ गोला परैं भूमि गाजैं ॥७६९॥ चलैं बाँन बेगं मचै सोर भारी । मनो आतसंबाज खेलंन कारी ॥ छुटैं बाँन कम्माँन ज्यौं मेघ धारा७ । लगैं बाज गज्जं हुवै वारपारा ॥७७०॥ मनो नाग छोना उड़ैं होड मंडी । डसैं अंग अंग करैं८ सेन खंडी ॥ बहैं तोमरं सेल ओ सक्ति ऐनं । करैं वार पारं बहैं९ उच्च वैनं ॥७७१॥ वहैं खङ्ग१० बेहद्द देखंत सूरं । १ सुज्झरं । २ आरपारं । ३ फाटिकं । ४ घनी । ५ बारं । ६ चद्दरै । ७ धारं, पारं अंत्यानुप्रास। ८ अंरी सेन । ९ बकैं । १० खग्ग । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri