हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो १२७ मिलियौ ससि सूरज गोन भनं ॥७३४॥ बर्षै हृद मह सुभद्द सदा । सु बहैं बहु भाँति सुभद्द¹ मुढ़ा ॥ सिर ढाल ढलक्कत एमि लसैं । ससि जीव धरासुत एक बसैं ॥७३५॥ अधधुंध चलै मग उम्मगयं । मनु काल कराल उठे जगयं ॥ चरखी बहु बाँन जु नेज लियं । धरि सेन सुअग्र² सुभाय क्रियं ॥७३६॥ पढ़ लंगद ओर जँजीर³ जुटे । नहिं खुल्लत आदुव न्याय लुटे⁴ ॥ बल रासि अमाँन⁵ सुक्रोहभरे । नन चालत⁶ मग्ग अमग्ग अरे ॥७३७॥ बहु दुंदुभि घोर सुनैं श्रम्रनं⁷ । बिरदाय सुनंत करैं गमनं ॥ सिर चौर दुरंत इसे दरसैं । तम दाबि⁸ दिनेस मरीचि लसैं ॥७३८॥ चतुरंगनि राव हमीर तनी । सब भाँतिन सोभ अनंत बनी ॥ सब रावत आय जुहार क्रियं । चहुवाँन सबै सिर भार दियं ॥७३९॥ धरि अग्र⁹ सु पिल्लन¹⁰ डिल्ल¹¹ पिले । बहु चंचल बाजिन लाज¹² खिले ॥ १ नद्द । २ अग्रग । ३ जंजिर जोर जटे । ४ छुटे । ५ अमावन । ६ चल्लत । ७ स्रवनं । ८ दब्बि । ९ अग्रग । १० पीलन । ११ डील । १२ साज । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri