हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ हम्मीररासो बहु दुंदभि बाजत¹ घोर घनं । पट गोमुख भेरि सु चंग मनं² ॥७४०॥ सहनाइय सिंधुर राग ररं । बिरदावत बंदि कबिंद भरं ॥ उमगे चहुवाँन बिकट्ट दलं । अप अप्प सु बीर कराय हलं ॥७४१॥ चहुँ ओर कितेक सु पुंगल कै । करिहा³ सजि संग चले बलकै ॥ तिनकी सज मानव चित्र रचे । धरि दूर नजदीक करै सु रचै ॥७४२॥ असवारिय सज्ज बनी तिनतैं । खबरैं बहु लेत घने बन तैँ ॥ बहु तोप जलेबिन⁴ अग्र बनी । सब सिंदुर लेप करी जु घनी ॥७४३॥ तिन ऊपर बैरख बूंद सजी । जम की मनु जीभ अनेक गजी ॥ बलि देत चलै अरिबृंद भखै । मद चक्कर मक्खर⁵ कोप धखै ॥७४४॥ हथनारि जँबूर सु म्वद्दरयं । लुटिया तुबकै बहु अहरियं ॥ धरि अग्र सबै चहुवाँन चढ़े । बहु बंदि कबिंद सुछंद पढ़े ॥७४५॥ इहिं भाँति उभै दल कोप कियं । हरखे बर बीर सुधीर हियं ॥७४६॥ १ बजत । २ हनं । ३ करहा ( ऊँट ) । ४ जलेवय, अग्ग । ५ मक्खत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri