हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ हम्मीररासो नच्चैं रुंड' बीर', धरन्नी सरीर' २ । सिर' हक्क³ मारैं, धरैं अत्र धारैं ॥८०१॥ उरब्भंत अंतं, मनो ग्राह तंतं । गह्रैं अंत चिल्ल़ी४, अकासं संमिल्ली ॥८०२॥ मनो बाल मड्डी५, उड़ावंत गुड्डी । उड़ै ६ स्रोण छिच्छं, फुँवारे ७ सु अच्छं ॥८०३॥ बहै स्रोण नद्दं, मनो नीर भद्दं । भरै पग्ग हत्थं, तरब्बूज मत्थं ॥८०४॥ पलक्की चमक्की, उठैं बीर नच्ची । कियौ अट्टहासं, सुकाली प्रकासं ॥८०५॥ जहाँ चेत्रपालं, गुहैं संभु मालं । भखै गिद्ध बोटी, फटै तासु पोटी ॥८०६॥ षट सहस' सूरं, वरे जाय हूरं । गजं तीस पारे, पहारं करारे ॥८०७॥ सतं दोय बाजी, परे खेत साजी । तहाँ पद्म सैनं, रहे देखि८ नैनं ॥८०८॥ तबै सेख सीसं, नवाए सरीसं । हमीरं सुरावं, कहैं बैन चावं ॥८०९॥ दुहुँ सैन मध्ये, महिम्मा सु बध्ये । कहैं उच्च बाचं, सुनो राव साचं ॥८१०॥ लखो हत्थ मेरे, बड़े बैन तेरे । सुनो साहि बैनं, लखो अप्प९ नैनं ॥८११॥ खरो मैं जु खूनी, रहे क्यों ज मुनी । गहो क्यों न अब्बं, कहै बैन तब्बं ॥८१२॥ १ रुद्र । २ सुजीरं । ३ हाका । ४ चिल्हों, मिल्ही-अंत्यानुप्रास । ५ ठड्डी । ६ उडैं । ७ फुहरैं, फुहारैं । ८ दिक्ख, पिक्ख । ९ आप । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri