हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· हम्मीररासो १४१ दोहा छंद दोऊ बंधु रिसाइ कै, लई बाग १ इमि संग । उतरि खेत मैं निजि उभै, कीनौ हरष उमंग ॥८३६॥ मीर गाभरू पाँय परि, हुकम माँगि कर जोरि। स्वामि काज तन खंडिये, लगै २ न कबहुँ खोरि ॥८३७॥ हनूफाल छंद मिलि बंधु दोऊ ध्याय । बहु हरष कीन ३ सुभाय । अब स्वामि धर्म सुधारि । दोउ उठे बोर हँकारि ॥८३८॥ असमाँन ४ लग्गिय सीस । मनो उभै काल स दीस ॥ इत कोप महिमा कीन्ह । हम्मीर नौन सु चीन्ह ॥८३९॥ उत मीर गभरू आय । मिलि सेख कै परि पाँय ॥ फर तेग बेग समाहि । रहे दुहूँ सेन सचाहिं ॥८४०॥ कम्माँन लीन सु हत्थ । जनु ५ सार कार सुपत्थ ॥ धरि स्वामि काज ६ समत्थ । दोउ ७ उभै जुद्ध सपत्थ । ८४१॥ दुहुँ द्वंद जुद्ध सुकीन । मनु जुटे मल्ल नवीन ॥ तरवारि बज्जिय ताय । मनु लगी ग्रीषम लाय ॥८४२॥ कटि चरण सीसरु हत्थ । परि लुत्थ जुत्थ सु तत्थ ॥ घमसाँन थाँन सु धीर । घर धरण(नि) खेलत बीर ॥८४३॥ गजराज लुट्टत भुम्मि । बहु तुरँग परत सु झुम्मि ॥ बिव बीर बज्जिय सार । तरवारि बरसहु ८ धार ॥८४४॥ दोउ भ्रात स्वामि सकाँम । जग मै किये अति नाँम ॥ दोहुँ बीर देखत हूर । चढ़ि गए मुख अति नूर ॥
१ बग्ग । २ लषकत कबहुँ खोरि । ३ कियउ । ४ असमाँन सीख ( मत्थ ) सुलग्ग ( लगि ) । मनु उभै काल सुजग्ग । ५ बर खार धार सुपत्थ । ६ कज धर्म । ७ मनु उभ्यो । ८ फरसहु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri