हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ७ तिनकैँ रिचीक भए पुत्र आय। जमदग्नि भए तिनकै सुभाय ॥३२॥ ऋषि जामदग्नि सुत परसराँम। हनि छत्र सकल द्विज तेजधाँम ॥३३॥ दोहरा छंद ब्रह्मा कै सुत भृगु भए, भार्गव भृगु कै गेह। ऋषि रिचिचक ताकै भए; तेज-पुंज तप-देह ॥३४॥ जामदग्नि तिनकै भए, परसराँम सुत जाहिं। छत्र मेटि विप्रन दइय, भुंमि किती वर ताहिं ॥३५॥ कमलासन कुल मैं प्रकट, परसराँम रणधीर। सहस्रारजुन बैर तैं, हने जु क्षत्री वीर ॥३६॥ बार इक्कीस जुद्धि जिन, दिन्नौ^१ उर्बीराज। बच्यौ न छत्रो जगत तब, आए तप कै काज^२ ॥३७॥ छंद मुक्तादाम हने क्षिति कै सब बीर अपार। भरे बहु कुंड जु शोणित धार ॥ करे तिहिं पितृन तरपन नोर। भए सब हरषित पित्र सधीर ॥३८॥ दए तब आसिष प्रेम समेत। चले ऋषिराज तपःकृत हेत ॥ रह्यौ नहिं क्षत्रिय जाति बिसेष। भए निरमूल जु छत्र अशेष^३ ॥३९॥ बचे कछु दीन मलीन सुवेस। कहूँ तिनकै अब रूप अशेष ॥ १ दीनौ। २ अप्प (आप) गए तप काज। ३ विसेपु। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri