भारतकोश
हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 258 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

८ हम्मीररासो धरे तृणदंत¹ कि दीन बयन्न² । . किये नियरूप लखे जु नयन्न ॥४०॥ नपुंसक बालक बृद्ध सु दीन । धरे मुख नक्ख सुबैन सहीन ॥ तजे तिन आयुध पिट्ठि दिखाय । गहे तिन आय सुभाय सुपाय ॥४१॥ मिले सब पित्र सु³ दीन असीष । भए सुअ निरभय पित्र जगीस ॥ तजो अब उग्ग⁵ असेष सुभाव । करो सब⁶ उप्पर क्षोभ सु चाव ॥४२॥ तजे तब क्रोध भए सु दयाल । चले पद बंदि पिता पद⁷ हाल ॥ भई कछु काल क्षत्री बिन भुंमि । नहीं जग रक्ष रह्यौ सोइ पुंमि⁸ ॥४३॥ बढ़े⁹ रजनोचर बृंद अनेक । मिटे जप तप्प जु वेद बिबेक ॥ करे उतपात सुघात अपार । तजे कुल-धर्म्म सु आश्रम च्यार¹⁰ ॥४४॥ मिटी मरजांद रहे सब भीत । तबै ऋषिराजन बढ़्ढत¹¹ चीत ॥ जुरे ऋषि-बृंद सु अरबुद आय । जहाँ ऋषि चाय बसैं सत भाय ॥४५॥ सुर नर नाग मिले सह आय । १ तनदंत । २ नयन्न । ३ जु । ४ अनिरिय । ५ उग्र । ६ बन । ७ पहु,पट्ट । ८ नहीं जग रच्छिक यो जग पूमि । ६ वचे । १० चार । ११ बाढत, बाढन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri