हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ हम्मीररासो धरे तृणदंत¹ कि दीन बयन्न² । . किये नियरूप लखे जु नयन्न ॥४०॥ नपुंसक बालक बृद्ध सु दीन । धरे मुख नक्ख सुबैन सहीन ॥ तजे तिन आयुध पिट्ठि दिखाय । गहे तिन आय सुभाय सुपाय ॥४१॥ मिले सब पित्र सु³ दीन असीष । भए सुअ निरभय पित्र जगीस ॥ तजो अब उग्ग⁵ असेष सुभाव । करो सब⁶ उप्पर क्षोभ सु चाव ॥४२॥ तजे तब क्रोध भए सु दयाल । चले पद बंदि पिता पद⁷ हाल ॥ भई कछु काल क्षत्री बिन भुंमि । नहीं जग रक्ष रह्यौ सोइ पुंमि⁸ ॥४३॥ बढ़े⁹ रजनोचर बृंद अनेक । मिटे जप तप्प जु वेद बिबेक ॥ करे उतपात सुघात अपार । तजे कुल-धर्म्म सु आश्रम च्यार¹⁰ ॥४४॥ मिटी मरजांद रहे सब भीत । तबै ऋषिराजन बढ़्ढत¹¹ चीत ॥ जुरे ऋषि-बृंद सु अरबुद आय । जहाँ ऋषि चाय बसैं सत भाय ॥४५॥ सुर नर नाग मिले सह आय । १ तनदंत । २ नयन्न । ३ जु । ४ अनिरिय । ५ उग्र । ६ बन । ७ पहु,पट्ट । ८ नहीं जग रच्छिक यो जग पूमि । ६ वचे । १० चार । ११ बाढत, बाढन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri