हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ६ रचे रजनीचर मेटि उपाय¹ ॥ मिले कमलासन और बसिष्ठ। कियौ² सुचि कुंड अनङ्ग³ सुइष्ट ॥४६॥ दोहरा छंद चाय आय अरबुद सुनग⁴, मिलिय⁵ सकल ऋषिराय । तब आराधिय संभु तिन , दिन्नौ दरसन आय⁶ ॥४७॥ जटा मुकट बिभूूति अँग , सीस गंग अहि अंग⁷ । भूत संग अनभंग मन , हरषित अधिक उमंग ॥४८॥ ऋषिसमूह अस्तुति करत⁸, करव (करो)⁹ अचल नग¹⁰ आय। बास करो तिहिं पर अचल, यज्ञ करें तव पाय ॥४९॥ छप्पय छंद तब भव भये¹¹ प्रसन्न बास अरबुद सिरं किन्मिव । कियव यज्ञ आरंभ विप्र सम्मूह¹² सुलिन्निव ॥ द्वैपायन, बासिष्ठ, लोम, दाल्भि,¹³ सम्र आए। जैमिनि हरषन, धौम्य, भृगू, घटयोनि¹⁴, सुभाए ॥ कौसिकह+, बत्स, मुद्दल मिलिउ, उदालीक, मातंग, भनि । स्वर मिलिय स्वयंभुव संभुजुत लगे करन मख मुदित मन ॥५०॥ पुलह, अत्रि, गौतम सम्, गरग, संडिलि महामुनि । भरद्वाज, जाबालि, मारकंडेय, इष्ट गुनि ॥ . १ मेटन पाय । २ किये । ३ अनिल । ४ गन । ५ मिले । ६ धाय । ७ संग । ८ करिव, करथव । ६ करत । १० मन । ११ भयउ । १२ सम्मुहँ सुइ लिन्निव । १३ दालिंभ सु । . १४ जोनि ।
- पुलह अत्रि गौतमहिं गरग सांडिल्ल महामुनि । भरद्वाज जाबालि मारकंडेय उध्म ( उद्दम ) गुनि । ये दो चरण एक प्रति में अधिक हैं सो दूसरी प्रति में दूसरे छप्पय में आए हैं । ६