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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

हम्मीररासो ६ रचे रजनीचर मेटि उपाय¹ ॥ मिले कमलासन और बसिष्ठ। कियौ² सुचि कुंड अनङ्ग³ सुइष्ट ॥४६॥ दोहरा छंद चाय आय अरबुद सुनग⁴, मिलिय⁵ सकल ऋषिराय । तब आराधिय संभु तिन , दिन्नौ दरसन आय⁶ ॥४७॥ जटा मुकट बिभूूति अँग , सीस गंग अहि अंग⁷ । भूत संग अनभंग मन , हरषित अधिक उमंग ॥४८॥ ऋषिसमूह अस्तुति करत⁸, करव (करो)⁹ अचल नग¹⁰ आय। बास करो तिहिं पर अचल, यज्ञ करें तव पाय ॥४९॥ छप्पय छंद तब भव भये¹¹ प्रसन्न बास अरबुद सिरं किन्मिव । कियव यज्ञ आरंभ विप्र सम्मूह¹² सुलिन्निव ॥ द्वैपायन, बासिष्ठ, लोम, दाल्भि,¹³ सम्र आए। जैमिनि हरषन, धौम्य, भृगू, घटयोनि¹⁴, सुभाए ॥ कौसिकह+, बत्स, मुद्दल मिलिउ, उदालीक, मातंग, भनि । स्वर मिलिय स्वयंभुव संभुजुत लगे करन मख मुदित मन ॥५०॥ पुलह, अत्रि, गौतम सम्, गरग, संडिलि महामुनि । भरद्वाज, जाबालि, मारकंडेय, इष्ट गुनि ॥ . १ मेटन पाय । २ किये । ३ अनिल । ४ गन । ५ मिले । ६ धाय । ७ संग । ८ करिव, करथव । ६ करत । १० मन । ११ भयउ । १२ सम्मुहँ सुइ लिन्निव । १३ दालिंभ सु । . १४ जोनि ।

  • पुलह अत्रि गौतमहिं गरग सांडिल्ल महामुनि । भरद्वाज जाबालि मारकंडेय उध्म ( उद्दम ) गुनि । ये दो चरण एक प्रति में अधिक हैं सो दूसरी प्रति में दूसरे छप्पय में आए हैं । ६

१० हम्मीररासो जरतकार जाजुल्लिय परासुर परम पुनीतव । चिमन १ चाइसुर आइ, पिप्पलायनहिं, सुरचि २ सब ॥ बोटा अनेक बरनूँ किते, पंचसिखा पिक्खिय प्रगट । तप तेज पुंज झलहलत तहँ, दरसन तैं पातक सुघट ॥५१॥ सिद्धि औषधिय सकल, सकल ३ तीरथ जल आनिवं । जिते यज्ञ कै योग्य तिते, द्रव् ४ सब मन मानिव ॥ जजन ५ जानि ६ अध्याय होम ध्वनि होम सु उठ्ठे । सकल वेद कै मंत्र बिप्र मुख सुर जुत जुठ्ठे ७ ॥ ध्वनि सुनत असुर आए तुरत करन यज्ञ उच्छिष्ट थल । उत्पात अमित किन्ने ८ तबै तहाँ बृष्टि किन्निय ९ सबल ॥५२॥ पवन चलत परचंड घोर घन वारि सु वु(उ)ठ्ठे । रुहिर १० माँस तृण पत्र अगि ११ रज देखत उठ्ठे ॥ गए तहाँ बासिष्ट यज्ञ बहु बिघ्न सुनायौ । करै १२ प्रथम वध असुर होय तब यज्ञ सुभायौ ॥ बासिष्ट कुंड किन्हौ सुरुचि करन असुर र्निमल तब । धरि ध्याँन होम बेदी बिमल बेद मंत्र आहूति जब ॥५३॥ दोहरा छंद ऋषि वसीष्ठ बेदिय बिमल, साम बेद स्वर साधि । प्रगट कियउ क्षत्रिय पहुभि, बेदमंत्र आराधि ॥५४॥ तीन पुरुष उपजे तहाँ, चालुक प्रथम पँवार । दूजै तीजै ऊपजे, छत्र १३ जाति पहिहार १४ ॥ ५५ ॥ कियउ १५ जुद्ध अतुलित तिनहिं, नहिं खल जीते मूरि । १ च्यवन । २ सुरख्यिय । ३ सकल तीर्थनु जल आन्यौ, तित्यौदक आन्यौ । ४ द्रव्य तितने मत मानिव, दर्व्य जितने मन मान्यौँ । ५ यजन । ६ जाप । ७ वुठ्ठे । ८ कीने । ६ कीनी । १० रुधिर । ११ अग्नि । १२ करो । १३ चतुरजाति १४ पारिहार । १५ कियौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ११ तब चतुरानन जज्ञ थल, कियौ तुरत वह दूरि ॥ ५६ ॥ आबू गिरि अग्नेव दिसि, चायस्थल सब आय। आराधे तिहिं फरस धरि, आए सीघ्र सुभाय ॥ ५७ ॥ कमलासन ब्रह्मा भए, होता भृगु मुनि कीन। आचारज वासिष्ठ भौ, ऋत्वज बत्स प्रचीन ॥ ५८ ॥ परसराँम जजमाँन करि, होम करन मुनि लाग। महासक्ति आराधि करि, अनलकुंड पटि¹ जाग ॥ ५९ ॥ छंद पद्धरी विधि करी² परसधर, बोलि ठौर। जजमाँन कियउ भृगुकुल सुमौर ॥ वरदेव सक्ति आराधि ताँम । चहुँ वेद वदन उच्चार जाँम ॥ ६० ॥ निज वारि कमंडल अग्नि सींच । रज संख पानि होमे स वीच ॥ चहुँ³ वेद मंत्र-बल सक्ति पाय । तब अग्नि रूप प्रगटे सुभाय ॥ ६१ ॥ उत्तंग अंग सुचि तेज-धाँम । झलहलत कांति तन प्रभा काँम ॥ भलहलत मुकट भ्रुकुटी करूर* । पलहलत नेत्र आरक्त मूर ॥ ६२ ॥ हलहलत दनुज वह त्रास मानि । भुज च्यारि दिग्घ⁴ आयुध सजानि⁵॥ जम जज्ञ पुरुष प्रगटे अजौनि । १ पदि । २ करे फरसधर । ३ चउ । ४ दोर्घ । ५ मान जान— अंत्यानुप्रास । *करूर (सं० कुरुल)—मस्तक पर बिखरी बाल की लट ।

१२ हम्मीररासो कर खग¹ धनुष कटि लसै तोनि ॥ ६३ ॥ कर जोरि ब्रह्म सों कह्यौ धाय । मैं करूँ कहा लोकेस आय ॥ जब कह्यौ कमलभू सुनहु तात । भृगुनाथ कहैं सुइ करो बात ॥ ६४ ॥ भृगुनाथ कही खल हनूँ धाय । सँग सक्ति दइय नृप कै सहाय ॥ दसबाहू उग्र आयुध बिसाल । आरूढ़ सिंह उर² कमल माल ॥ ६५ ॥ मुनिदेव मिले अभिसेष कीन । नृप अनल नाँम कह तासु दीन ॥ नृप कियौ जुद्ध तिनतैं अखंड । हनि जंत्रकेत करि खंड खंड ॥ ६६ ॥ हनि धूम्रकेत जो सक्ति आय । नृप हरष सहित परसे सुपाय ॥ बहु दैत्य नृपति मारे अपार । उठि चली खेत तैं रुहिर³ धार ॥ ६७ ॥ उबरे सु गए पाताललोक । भय दनुजहीन सब मृत्युलोक⁴ ॥ ६८ ॥ दोहरा छंद आसा पूरण सबन की, करी सक्ति तिहिं बार । याही तैं आसापुरा, धरयौ नाँम निरधार ॥ ६६ ॥ चहुवाँनन⁵ कै वंस मैं, परम इष्ट कुलदेवि । सकल मनोरथ सिधि तहाँ, पूजत पावै सेवि⁶ ॥ ७० ॥

१ खड्ग । २ गला। ३ रुधिर धार । ४ मर्त्यलोक । ५ चाहुव्वान। ६ देव, सेव—अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १३ परसराँम अवतार भौ१, हरन सकल भुव-भार । जैत राव तिहिं बंस मैं, जन्म्यौ परम उदार ॥ ७१ ॥ छप्पय छंद जैत राव चहुवाँन सकल बिद्याजुत सोहै। दाँन कृपाँन बिधाँन अखिल भूपति मन मोहै॥ अमित थाट रजपूत बंस छत्तीस अमानो। सूर बीर उद्दार२ बिरद बंदी जु बखानो ॥ दिन प्रत्ति तेज बड्ढिय३ नृपति, सत्रु संक निसि दिन रहैं। बिस्सलह४ भूप अवतंस भुव, अरथिन् मिलि दारिद दहँै ॥७२॥ इक्क समय आखेट, राव खेलन बन आए५ । सकल सुभट थट संग, बीर बानै जु बनाए ॥ लखव६ इक्क बाराह, बाजि पिच्छै नृप दिन्निव । रहे७ संग तैं दूरि, सध्य बिन राव सु किन्निब ॥ बन बिखम वंक भूधर बिरह, सुथल पदम भव तप करत । मृग त्यागि भागि मिल्ले सुऋषि, बंदि चरण सचा धरत ॥७३॥ छंद लघुनाराच करे प्रणाम रावयं, सुदिन्न पद्म पावयं । उभै सुपाणि जोरि कै, बिनै सु कीन कोरि कै ॥ ७४ ॥ खुले सुभाग्य मोरयं, लह्यो दरस तोरयं । अखंड जोग भूपयं, नमः सजीव मोखयं* ॥ ७५ ॥ त्रिकाल ज्ञान धाँमयं, रटंत नाँम राँमयं । समस्त योग धाँमयं, त्रिलोक पूर काँमयं ॥ ७६ ॥ १ भयौ । २ उदार । ३ बढ़तो, बड्डिग । ४ बीसलह । ५ आयउ, बनायउ । ६ लखिव । ७ रह्यउ ।

  • मोखयं—मोक्ष ।

१४ हम्मीररासो समीप स्वामि संकरं, गणेशयं सुधं करं । धरौ सुसीस हथ्थयं, प्रभू¹ सदा समथ्थयं ॥ ७७ ॥ दोहरा छंद प्रसन भए ऋषि पद्म तब, अस्तुति सुनत प्रमाँन² । जैत राज यहिँ थल करो, राव राखि सिव ध्याँन ॥ ७८ ॥ हर प्रसन्न भय राव पहँ, मुनिबर पद्म प्रसाद । मिले भील-कुल सकल तहँ, हरषित मिटे बिषाद् ॥ ७९ ॥ छंद पद्धरी ऋषिराज पद्म आज्ञा सुपाय । नृप जैत मित्र मंत्रिय बुलाय ॥ बड़ वणिक गणक कोबिद सुजाँन । तिन पुच्छि मंत्र वास्तव प्रमाँन ॥ ८० ॥ सुभ दिए मुहूरत नीब हेत । रणथंभ नाँम औ गढ़ समेत ॥ सव ग्यारह सै दस बरष और । सुइ संबत बिक्रम कहत मौर ॥ ८१ ॥ इषु अर्द्ध अरंगा को प्रसिद्ध । रबि अयन सौम्य जान्यौ प्रसिद्ध ॥ सत्र कला पाँच जानो सुइष्ट । त्रिय पुरुष लग्न गढ़ कीन इष्ट ॥ ८२ ॥ गत इक अंस वृषभाँनु जानि । ससि बेद् सार्द्ध मिथुनेस मानि ॥ तृन अंस वृस्चिक कै इलानंद । ससि बीस³ नंद अज अंस मंद ॥ ८३ ॥ १ प्रभु सदा सर्थयं । २ अमाँन । ३ अंश । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १५ जष* रासि जानि नव अंस सुद्ध । तम तीन अंस मूरति समुद्ध x ॥ त्रिय धूमकेतु गुण अंस जानि । भृगु सप्त गुरू¹ सत्रा सु मानि ॥ ८४ ॥ तन लग्न उभै जानो सु जानिं । फल कह्यौ वरष सत आयु मानि ॥ षय भाव भौंन तिहिं भवनहीन । कछु घटे बरष तिन मैं प्रवीन ॥ ८५ ॥ तिहिं समय अटल थूणी सथप्प । गणनाथ पूजि सुभ मंत्र जप्प ॥ करि होम देव पुज्जे अपार । गो भुंमि रत्न हाटक सुढार ॥ ८६ ॥ दिय दाँन द्विजिन बहु विधि अनेक । नृप जैत सकल पुज्जे विवेक ॥ तिय करत गाँन मंगल सरूप । धुनि दुंदभि बज्जत अति अनूप ॥ ८७ ॥ सब करहिं हरष नर नारि बृंद । यहि भाँति नीम रचना सुछंद ॥ ८८ ॥ दंहरा छंद ग्यारा सइ दस अगरो, संवत माधव मास । सुक्कु तीज शनिवार कें, चंद्र रक्ष अनयास ।'८६॥ थूणीगढ़ रणथंभ की, रोपी पदम् प्रताप । सुमरि गणेस गिरीस कौ, नगर बसायौ आप² ॥९०॥ १ सतम गुरु । २ आय ।

  • जष ( झष )=मीन ( राशि ) X समुद्ध=समृद्ध । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१६ हम्मीररासो वार्ता ( वचनिका ) राव जैत पदमं ऋषि की आज्ञा तैं गढ़ रणथंभ की नीम दिवाई। ताही समय सहर बसावन की मन मैं आई। ( रणथंभ की नीम का लग्न ) ग्यारा सै दसोत्तरा कौ संवत् बैसाख की आखै तीज (अक्षय त्रितिया) मैं सनिस्रचर मैं घड़ी पाँच दिन चढ़े मिथुन लग्न मैं नीम दीनी। गणेश पूजकर सिवजी की और पद्म ऋषि की आज्ञा पाय अनेक उछाह करि धन दीनौ। चौपाई जैत राव थिर थूणी रुंधिय × । भूसुर बृंद वंदि पद उत्थिय ॥ ध्वजा पताक कलस अरु तोरन। मंगलरूप सुरूप निचोरन ॥९१॥ इष्ट लग्न सू० ५ ॥ २ । ८ ॥ १ । ०० चं० ३ । ४ । मं० ७ । ३०० । २० । वृ० ८ । १७ । शु० २ । ७ श० ११ । १ । रा० २ । ६ के० । ३ छंद भुजंगप्रयात पुरं मंदिरं चौहटं औ गवाक्ष्यं + । भुजंगप्रयातं सुंदरं प्रबंधं सुभाष्यं ॥ पुरी इंद्र की सीस वै सुभ्र देखी। सबै मंदिरं सुंदरं उच्च लेखी । ९२ ॥ पड़द्दा जरी बाफतं * कै बनाए। × रुंधिय=रुँधा, स्थिर किया। + गवाक्ष्यं (गवाक्ष)=झरोखा।

  • बाफतं (बाफता)=एक प्रकार का रेशमी वस्त्र जिसपर कलाबत्तू और रेशमी बूटियाँ होती हैं। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १७ ध्वजा तोरणं सर्व कै गेह छाए ॥ कपाटं सिरीखंड हाटक ÷ सोहैं । सबै चित्र सा चित्र सूचित्त मोहैं ॥ ९३ ॥ बिदाँनं छए झल्लरी सोभसाँनी । सबै ठौर सोहै मनो कामरानी ॥ गृहं द्वार गोखा झरोखा सुहाए । सुगंधं चुवा इत्र महकंत भाए । ९४ ॥ यसो नग्र रम्यं रच्यौ भूप केरो । किते चारु चौकंत भावंत हेरो ॥ बसैं वर्ण च्यारचौ जथासंखि बासं । चहूँ आश्रमं औ तजं लोभ आसं ॥ ९५ ॥ सबै आय आयं रहै धर्म माहीं । छिमासील दाँनं वृतं नीत १ आहीं ॥ ९६ ॥ छप्पय छंद महा वंक गढ़ दृड्ढ़ बुरजि २ कंगुर बर सोहैं । चहूँ कोढ़ ३ अग अगम चारु दरवाजे मोहैं ॥ घाटी चतुरासीति ४ बिषम अति ५ पच्छि न पावैं । वनचर वंकट वेस पाय लगि यों गुन ६ गावैं ॥ तुम नाथ हमारे ७ कृपाकरि ८ गढ़ लज्जा यह ९ धारिये । परबेस मनहुँ रवि को प्रकट यह गढ़ हम प्रति पारिये ॥९७॥ दोहरा छंद च्यारि दरा चहुँ १० ग्राम बसि, घाटी किती जु और । चहूँ ओर पर्वत अगम, बिचरण थंभ सु जोर ॥९८॥ १ नित्य । २ सुदृढ़ गुरजि । ३ कोध । ४ घाटी चोइससाठि । ५ अति, गति । ६ मुख । ७ हमार । ८ करी । ६ हम । १० चउ । ÷हाटक( हाटक )=सोना । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

१८ हम्मीररासो अथ पद्मऋषि तपपात प्रसंग छप्पय रणतभँवर ऋषिद्म उग्रतप तेज कराए१। इंद्रासन डिगमगिय२ देवपति३ संका खाए॥ तब कामादिक बोलि सक्र ऋषि पास पठाए। करो बिघ्न तब जाय भंग पर काज नमाए४। तब चल्यव मार निज सेन जुत५ ऋतु वसंत प्रगटिय तुरत। बह त्रिविध पवन अद्भुत महा करहिं६ गान रंभा सुरति ॥९९॥ बसंत ऋतु वर्णन छंद पद्धरी तिहिं समय काम प्रेरयौ सुरिंद्र। जुहारि इंद्र उठि पाव वंदि॥ सब परिकर बोले७ चढ़ि सुमार। ऋतु छहूँ संग धनु सुमन हार ॥ १०० ॥ रति परम प्रिया ऋतुराज जानि। नित रहत निरंतर रूप मानि॥ बहु किन्नर गावत देवनारि। गंधर्व संग अति बल उदार ॥ १०१ ॥ संगीत भाव गावैं अनंत। सुर नर सुनंत बसि होत मंत॥ बन उपबन फुल्लहिं अति कठौर। रहे जौर मौर रस अंबमौर ॥१०२ ॥ १ करायौ । २ डगमग्यौ । ३ इन्द्र मन माहिं ( माँझि ) डरायौ । ४ नठाए । ५ जुरि । ६ करति । ७ बुल्ले । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो १६ कल कूजत कोकिल ऋतु बसंत । सुनि मोहत जहँ तहँ सकल जंत ॥ नर नारि भए कामंध अंध । तजि लाज काज परि काम-फंद ॥ १०३ ॥ पहुँचे सुमारि ऋषि निकट आय । प्रेरेचौ सु परम भंट अग्ग जाय ॥ ऋषि लखे सुभट सेना सुकाम । ऋषि कह्यौ कहा करिहै सुबाम ॥ १०४ ॥ करि कठिन आप लाई समाधि । तिहिं रहत काम क्रोधारि व्याधि ॥ ग्रीष्म ऋतु वर्णन ऋतु ग्रीषम कौ आज्ञा सु दिन्न । तिहिं अति प्रताप जाज्वल्लि किन्न ॥ १०५ ॥ रबि तपै बिखम अति किरन धूप । रवि नै १ खुल्लि दिक्खिय अनूप ॥ वट इक्क महा गह्नर सुजानि । तिहिं निकट सरोवर सुरस मानि ॥ १०६ ॥ इक आश्रम सुंदर अति अनूप । तिय गान करत सुंदर सरूप ॥ सौरभ अपार मिलि मंद पौन । मृगमद कपूर मिलि करत गौन ॥ १०७ ॥ श्रीखंड *मेद १ केसर उसीर । तिहिं परसि ताप मिट्टत सरीर ॥ १ मेरु ।

  • मेद=कस्तूरी । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

२० हम्मीररासो गंधर्ब और किन्नर सुबाल । मिलि अंग रंग पहरैं सुमाल ॥ १०८ ॥ चित चल्यौ नाहिं ऋषि बज्रमॉँन । रहिग्रीष्म १ ऋतू हिय हारि मॉँन ॥ १०९ ॥ दोहरा छंद लग्यौ न ग्रीषम कौ कछू, ऋषि प्रताप तपधीर । तब पावस परनॉँम करि, आयस कॉम गहीर ॥ ११० ॥ वर्षा ऋतु वर्णन छंद भुजंगप्रयात उठे बद्दलं घोर आकास भारी । भई एक बारं अपारं अँध्यारी ॥ बहैं पौन चारस्यों महा सीतकारी । चहूँ ओर क्रोधंत दामनि अँध्यारी ॥ १११ ॥ घने घोर गज्जंत बर्षंत पानी । कलापी पपीहा रटैं भूरि बानी ॥ तहाँ बाल भूलंत गावंत भीनी । रही जाय आश्रम भई कॉमभीनी ॥ ११२ ॥ उड़ैं चीर सम्मीर लग्गंत अंगं । लसे गात देखंत जग्गै अनंगं ॥ करैं सोर झिल्ली घने दद्दुरंगे । तहाँ बाल लीला करैं कॉम संगे ॥ ११३ ॥ निकट्टं उघट्टंत संगंत बाला । बरं अंग अंगं रची फूलमाला ॥ —————— १ ग्रीष्म । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो २१ कटाछं करैं मंद हासं प्रसारैं¹। तहाँ पद्म अंगं लगै ना निहारैं ॥ ११४ ॥ दोहरा छंद पावस हारि बिचारि जिय, ऋपि न तज्यो तप आप। तब सु मैन मन मैं कहिय, उपजे सरद सुताप ॥ ११५ ॥ शरद ऋतु वर्णन छंद त्रोटक तजिये तप पावस बित्ति सबं। ऋतु² सारद बादर दीस अचं ॥ सरिता सर निम्मल नीर³ बहैं। रस रंग सरोज सु फुल्लि रहैं ॥ ११६ ॥ बहु खंजन रंजन भृंग भ्रमैँ। कलहंस कलानिधि बेदि* भ्रमैँ ॥ बसुधा सब उज्ज्वल रूप कियं। सित बासन जानि बिछाय दियं ॥ ११७ ॥ बहु भाँति चमेलिय फूलि रही। लखि मार सुमार सुदेह दही ॥ बन रास बिलास सुवास भरैं। तिय काँम⁴ कमाँन सुतानि धरै ॥ ११८ ॥ समर्गों⁵ पर तैं नर काँम जगै। बिरही सुनि कै उर ध्याव⁶ खगै ॥ घर अंबर दीपग जोति जगी। १ प्रहारैं । २ रति । ३ बारि । ५ बाँन । ५ श्रमगे । ६ घाव । * बेदि-( बेधि )=बेधकर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

२२ हम्मीररासो नर नारि लखैं उर प्रीति पगी ॥ ११६ ॥ ऋषि पास त्रिया सर न्हान रच्यौ । जल केलि अनेक१ प्रकार मच्यौ ॥ बिन चीर अधीर लखै नर वै । कुच पीन नितंब सुकाँम तबै ॥ १२० ॥ कबरी छुटि नागनि सी दरसै । सुर संग भ्रमै रस सों सरसै ॥ ऋषिराज महा उर धीर अयं । रितु सारद हारि सुजात रयं ॥ १२१ ॥ दोहरा छंद हारि मानि सारद् गइय, उठि हेमंत सकोपि । महासीत प्रगटिय जगत, सवै लाज तजि लोपि ॥ १२२ ॥ हेमंत ऋतु वर्णन छप्पय छंद तब सुहेम करि कोप सीत अति जगत प्रकास्यौ । बिखम तुषार अपार मार उपचार सुभास्यौ२ ॥ कंपत ३ चैतन रूप कहा जर जरत समूरे । तिय हिय लगि लगि बचन चरत मुख सैन सरूरे ॥ तिहिं समय जीव सब जगत के भए इक्क नर नारि सब । उरबसी आय ऋषि निकट तँक४ हिये लाय मौंहिं५ सरन६ अब ॥१२३॥ दोहरा छंद खुली न कठिन समाधि ऋषि, चली हिमंत सुहारि । सिसिर परस मन बरनि करि, उठी सुकाँम जुहारि ॥१२४॥ १ अपुब्ब । २ सुभाष्यौ । ३ नचौ । ४ तैं,लौं । ५ मुहिं । ६ सरनि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो २३ शिशिर ऋतु वर्णन छंद मोतीदाम कियौ तब मार हुकम्म सु हेरि। उठी सिसिरौ¹ तव आयसु फेरि ॥ किये नव पल्लव जे तरु वृंद। प्रफुल्लित अंब कदंव स्वच्छंद ॥ १२५ ॥ बहैं बहु भाँति त्रिबिद्धि समीर । रहै नहिं धीरज होत अधीर ॥ लता तरु भेंटत² संकुल भूरि । भए तृण गुल्म हरे जड़ मूरि ॥ १२६ ॥ मिटै जग सीत न ताप न तोय । सवै सुखदायक जोवन सोय ॥ झुके फल फूल लता बर भार । भ्रमैं बहु भृंग जगावत मार ॥ १२७ ॥ लगी लखि बायु सबै तिहिं बार । सुने डफ लाज तजैं नर नार ॥ बजावत गावत नाचत³ संग । अबीर गुलालरु केसरि रंग ॥ १२८ ॥ भए मतवार सु खेलत⁴ फाग । महा सुख संग सँजोगगनि⁵ भाग ॥ बियोग्गनि जारत मारत मार । अनेक सुगंध अनेक बिहार ॥ १२६ ॥ १ ससियौ । २ भिंटत । ३ नच्चहिं । ४ खिल्लत । ५ सँजुग्गनि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

२४ हम्मीररासो वसंत ऋतु वर्णन छंद लघुनाराच असंत संत मोहियं, बसंत खोलि जोहियं । बजंत¹ बीन बाँसरी, मृदंग संग आँसुरो ॥ १३० ॥ लियं सुबाल बृंदयं, जगत्त कामँ द्वंदयं । अनेक रूप सुंदरी, मनोज राव की छुरी ॥ १३१ ॥ स्वबेस केस पासयं, मनो कि मैन फाँसयं । गुही त्रिबिद्धि बैनियं, कि मोह किन्न² सैनयं ॥ १३२ ॥ महा सुघट्ट पट्टियं, सृँगार भूमि फट्टियं । बिचै सुमंद³ रेखयं, महा बिसुद्ध देखयं ॥ १३३ ॥ बिसाल भाल सोमियं, छपा सु नाथ लोभियं⁴ । सु मध्य सीस फूलयं, दिनेस तेज तूलयं५ ॥ १३४ ॥ भरी सु मुक्त मंगयं, मनो नक्षत्र संगयं । बिसाल लाल बिंदयं, मिले सु भोम चंदयं ॥ १३५ ॥ जराव आड भाइयं⁶, मनो मिलन्न आइयं । दिनेस भोम बुद्धयं, ससि गृहे सु सुद्धयं । १३६ । कपोल गोल आह्नसं, कि भौंह भौर साहसं । प्रफुल्ल कंज लोचनं, मृगाखिख⁷ गर्ब मोचनं ॥ १३७॥ त्रिबिद्ध रंग गातयं, सु स्याम स्वेत राजयं८ । बनी कि कीर नासिका, सु गत्थ नत्थ भासिका ॥ १३८॥ मनो सु काम ओपयं९, दयौ सुचक्र१० कोपयं । करन्न फूल राजयं, उभै कि भाँन साजयं ॥ १३९ ॥ १ सुढंग ताल खंजरी । उपंग संग श्रंसुरी । २ कीन । ३ सुमंग, माँग । ४ लोपियं । ५ तुल्यं । ६ भालय । ७ मृगासि । ८ रातयं । ६ वोपयं । १० चक्र । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो २५ सुहंत स्याँम अलकं, भ्रमत्त भौर वल्लकं । अरुन्न रेख बेसरं, पियूष कोस देखयं ॥ १४० ॥ अनार दंत कुंदयं, लसंत बज्र दंतयं¹ । बुलंत बाणि कोकिला, बिपंच की सुरं मिला ॥ १४१ ॥ कपोति पोति कंठयं, सुधार हार कंठयं² । छप्पय छंद कुच कंचन घट प्रगट, नाभि सरवर वर सोहै । त्रिबली पापहुँ ललित, रोम राजी मन मोहै ॥ पंचानन मधि देस, रहत सोभा हियहारी । मनहुँ काम के चक्र, उलटि दुंदुभि दोउ डारी³ ॥ दोउ⁴ जंघ रंभ कंचन दिपत⁵, घरी कमल हाटक⁶ तनै । गति हंस लखत मोहत जगत, सुर नर मुनि धीरज हनै ॥१४२॥ जिती उब्बरसी संग, सकल सम्मूह मिलिय वर । बिचि सु मैन सह सैन गए, ऋषि निकट मरूकर ॥ गावत बिबिधि प्रकार, करत लीला मन भाइय । हाव भाव परभाव, करत आश्रम मैं आइय ॥ ऋषि निकट आय होरिय रचो, बर्षत रंग अनंग गति । नन⁷ चलै चित्त ज्यों ज्यों⁸ अचल, करत कृया त्यों त्यों अमित॥१४३॥ दोहरा छंद. करि बिचार त्रिय कृत कृया, कुसुम कुंद गहि⁹ लीन । लीला ललित सु ब्रिथ्थरिय,¹⁰ चंचल बयसु नवीन ॥ १४४॥ ससि मुख बृंद¹¹ स्वच्छंद मिलि, रति सम रूप अनूप । ऋषि समीप क्रीड़ा करत, हरत धीर मुनि भूप ॥१४५ ॥ १ द्वंदयं । २ तंठयं । ३ निस्साँन सुधारी । ४ दुहुँ । ५ उलटि । ६ हारक । ७ चन । ८ मौ । ९ कहि । १० विस्तरी । ११ वोइ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

२६ हम्मीररासो चौपाई छंद बर्षत रंग अनंग सु बाला । मनहुँ¹ अनेक कमल की माला ॥ चंचल नैन चलैं चहुँ आसा । रूप सिंधु मनु मीन सु पासा ॥१४६॥ घूँघट ओट दुरत प्रगटत यौं । मनौं संसि घटा दबत उघटत ज्यौं ॥ बिलुलित बसन अंग दुति सोहै। निरखत सुर नर मुनि मन मोहै ॥१४७॥ अलक सलक² अतिसै चटकारी । अमी पियत³ ससि नागनि कारी ॥ छुटै गुलाल मुठी मृदु मुसकै । चूवै अधर⁴ बिंब रस चमकै ॥ १४८ ॥ करैं गान पसु पच्छी⁵ मोहैं । कहो जगत इन पटतर को है ॥ लै लै गेंद परस्पर मेलैं । बाल बृंद मिलि मिलि सुख मेलैं ॥ १५० ॥ अध ऊरध⁶ चहुँ ओर सुमारैं । लजति खिजति लगि⁷ प्रेम प्रहारैं । मंद पवन लगि चीर परयो धर । कुच अंकुर⁸ उर मनहुँ उभे हर ॥ १५० ॥ दमकति दिपति सलौंनी दीपति । कामलता बिहरैं मनु गज गति९ ॥ १ मनौं । २ चिलक । ३ पीवत, पवत । ४ अधर बिंब रसकै चसकै । ५ पच्छिय, पच्छी । ६ अद्ध उद्द । ७ मिलि । ८ अंबर । ६ झीन लंक अंग झलकत बर । नाभि गंभीर त्रिबलि अति सुंदर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

[Page Header] हम्मीररासो २७


लगत गेंद कंपित उर भागी । मंद मुसुकि ऋषि निकट सुपागी १ ॥ १५१ ॥ सुमन बूंद सौरभ उठि भारी । भ्रमर पुनीत२ गुँजार३ उचारी४ ॥ सरद उन्मद्५ संधाँन सु किन्हौ । अति रिसि तानि स्त्रवन उर दिन्हौ ॥ १५२ ॥ छुटि समाधि ऋषि नैन उघारे । अति सकोपि सम्मर उर मारे ॥ चहुँ दिसि चितै६ चक्रित ऋषि भयऊ । लखि तिय बृंद अनंद सु भयऊ ॥१५३॥ लीला गेंद फागु मिसि७ दौरी । हो हो करत उठी बर जोरो८ ॥ बन अकेलि तिय पुरुष न कोऊ । लीला अमित देखि दृग दोऊ ॥१५४॥ रंग अपार डारि ऋषि ऊपर । कल कल हंस बजत पद नूपर ॥ करैं९ कटाक्ष अनेक सु बाला । नैन सैन सर लगि चित चाला ॥१५५॥ अंग अंग गहि फाग१० सु मगै । परसि गात तब कॉंम सु जगै११ ॥


१ सुनि बादित्र गाँन कल लीला । कॉंम कोपि सर धनुष सुमीला । २ पुनिच । ३ गुंजार । ४ त्रिबिधि समीर सुहावन जानी । प्रफुलित नूत बैठि धनु पानी । ५ उन्माद । ६ चित । ७ मिलि । ८ कंदुक केलि और मिसि होरी । भोरी निपट लेत चित चोरी । डारि मोहिनिय मोहिव जाला । माया बसि भौ ऋषि तिहिं काला । ९ करत । ११ फाग सुमागै । ११ जागै ।


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२८ हम्मीररासो मुख मीँडत$^१$ अंजन गहि दिन्नौ । जग्यौ काँम ऋषि काँम सु भिन्नौ ॥१५६॥ लाख मुसक्यानि भई मति भोरी । जीति सरस$^२$ ऋषि काँमनि हेरी ॥१५७॥ ——— अथ तुलसीदास पूर्व पक्ष$^३$ दोहरा छंद का नहिं पावक जरि सकै, का न समुद्र समाय । का न करै अबला प्रबल, किहिं$^४$ जग काल न खाय ॥१५८॥ कबि लखन$^५$ अबला कहत, सबला जोध कहंत । दुर्बिला$^६$ तन मैं प्रगट जिहिं, मोहत संत असंत$^७$ ॥१५६॥ जीति सिसिर बित्तिय$^८$ तबै, फिरि आयव ऋतुराज । मिले उर्बसी पद्म ऋषि, सरे सक्र के काज ॥१६०॥ बिवस भए$^९$ मुनि अच्छरा$^{१०}$, भुलिय तप व्रत नेम । निसि बासर क्रीड़ा करत$^{११}$, वढ्यौ जु तन मन प्रेम ॥१६१॥ सुरति बढ़ी चित मैं चढ़ी, मढ़ी मोह मति भूरि । छिन छिन तिय ऋषि रजत$^{१२}$ दोउ, भयउ$^{१३}$ प्रेम परिपूरि ॥१६२॥ हृदय पुरंदर त्रास गनि, गइय$^{१४}$ उर्वसी त्यागि । बिन माया ऋषिराज तब, मन सुत्तो$^{१५}$ सो जागि$^{१६}$ ॥१६३॥ जाय जुहारे इंद्र कौ, काँम उर्वसी संग । कज्ज$^{१७}$ सँबारयौ रावरौ, करयौ कठिन तप भंग ॥१६४॥ —————————— १ माडत । २ ससिर । ३ अथ तुलसीदास रामायने पूरब पच्छि । ४ को । ५ लाखन । ६ द्विर्बिला, द्रुबिला । ७ अनंत । ८ बीती । ६ भयौ । १० अच्छरिय । ११ करै । १२ राज । १३ भरे । १४ गई । १५ सोवत सो । १६ लागि । १७ काज । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri