भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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( ११० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ खाती चिड़ाके मांसका गुण । तथा लघुर्वातहरः काष्ठकूतोऽग्निवर्द्धनः ॥ वातश्लेष्माधिको ज्ञेयः शीतलः शुक्रवर्द्धनः ॥ १३ ॥ अश्मरीं हन्ति विशदो बलकृन्मां- सतक्षणः ॥१४॥ खातीचिड़ाका मांस हलका है, वातको हरता है और जठराग्निको बढ़ाता है, वात और कफकी अधिकतासे संयुक्त है, शीतल है और वीर्यको बढ़ाता है ॥ १३ ॥ पथरीको हरता है सुन्दर है, बलको करता है, मांसको काटता है ॥ १४ ॥ अथ चकोर, तोता, मैना इनके मांसका गुण । चकोरोऽथ तथा शारी समदोषौ गुणागुणैः ॥ १५ ॥ चकोर, तोता, मैना इन्होंका भी मांस गुण और दोषोंसे समान है ॥ १५ ॥ अथ कुंजके मांसका गुण । क्रौंचो वृष्योऽतिरुचिकृदश्मरीं हन्ति नित्यशः ॥ शोषमूर्च्छाहरो वृष्यो हन्ति कासमरोचकम् ॥ १६॥ क्रौंचका मांस वीर्यमें हित है, अधिक रुचिको करता है, निश्चय पथरीको हरता है और शोष, मूर्च्छा, खांसी, अरुचि इनको नाशता है वीर्यमें हित है ॥ १६॥ अथ कोयलके मांसका गुण । कोकिलः श्लेष्मलो ज्ञेयः पित्तसंशमनो मतः ॥ १७॥ कोयलका मांस कफको करता है, पित्त शांत करता है ॥ १७ ॥ अथ विवृताक्षके मांसका गुण । वैवृताक्षस्त्रिदोषघ्नो बल्यः शुक्रविवर्द्धनः ॥ १८॥ विवृताक्षका मांस त्रिदोषको नाशता है, बलमें हित है और वीर्यको बढ़ाता है ॥ १८॥ अथ घरके चिड़ेके मांसका गुण । गृहस्य चटको वृष्यो बलशुक्रविवर्द्धनः ॥ सर्वदोषहरश्चापि दीपनो मांसवर्द्धनः॥ १९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे स्थलच- राणां मांसवर्गो नाम एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ घरकी चिड़ियाका मांस वीर्यमें हित है, बल और वीर्यको बढ़ाता है, सब दोषोंको हरता है, अग्निको जगाता है और मांसको बढ़ाता हैं ॥ १९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसू- नुवैद्यरत्निरत्नसाह्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने स्थलचराणां मांसवर्गो नाम एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥